धर्मशाला, नवनीत शर्मा। उम्मीद न होती तो क्या होता? ये सवाल अक्सर सिर उठाता है। आस, आशा, उम्मीद ये तमाम पर्यायवाची वस्तुत: होने और बने रहने की इच्छा के समानार्थक हैं। साल सिर्फ कैलेंडर में नहीं बदला, जमीन पर भी बदला है। ...और क्या पाया, क्या खोया से कहीं आगे आकर उम्मीदें फिर जवान हो उठी हैं। सेब के रंग और आकार को बढ़ाने की उम्मीद यानी बर्फ...। सर्दी में कांगड़ी का एहसास यानी नई योजनाओं, संकल्पों, प्रकल्पों और इरादों से मिलने वाली ऊर्जा।

और यह उम्मीद की ताकत ही है कि पहाड़ टूट कर भी खड़ा हो जाता है। उदासी के उस आलम के बीच भी जहां सियाचिन में एक जवान बर्फ का शिकार हो जाए...और उसके बारह घंटे के बाद उसकी मां भी बेटे के रास्ते पर चल दे। पहाड़ जानता है कि इस उदास मंजर के बीच भी पहाड़ की माताएं टूटेंगी नहीं। बहादुरी का यह क्रम जनरल जोरावर सिंह से शुरू होकर भंडारी राम, लाला राम तक आता है। फिर देश की आजादी के बाद इस सिलसिले को अपनी बहादुरी से नवाजते हैं पहले परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा और वहां से यह रास्ता कैप्टन विक्रम बतरा तक आता है।

इस बीच कितने ही उरी और पठानकोट आए होंगे....। इसी जज्बे को जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शिमला में याद करते हैं, हिमाचल को गर्व की अनुभूति होती है। बहादुरी पुरस्कारों में यह छोटा सा राज्य सबसे आगे दिखता है। लेकिन हिमालयन रेजिमेंट अब भी दूर की कौड़ी है। ये बात नई नहीं है लेकिन इसे दोहराया जाना इसलिए आवश्यक है ताकि सनद रहे। हिमालयन रेजिमेंट के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सहमत थे लेकिन तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने कहा कि अब राज्य के नाम पर रेजिमेंट नहीं हो सकती।

फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने हिमालयन रेजिमेंट की बात रखी लेकिन हुआ कुछ नहीं। यह सवाल इसलिए है कि हिमाचल प्रदेश शांत प्रदेश है। नागरिकता संशोधन विधेयक पर लगभग पूरा देश सुलगा था, लेकिन हिमाचल में ऐसी एक भी घटना सामने नहीं आई। यही हिमाचल होना है। यहां वैचारिक मतभेदों के लिए स्थान है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की आत्मघाती प्रवृत्ति नहीं है।

सेना ही क्यों, राजनीति में भी हिमाचल दिखता है। यहां से राष्ट्रीय दलों में भी हिमाचली उत्साह नेतृत्व की भूमिका में है। हिमाचल प्रदेश का सीना गर्व से फूलता है, जब यहां के सेना से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय शूटर विजय कुमार शर्मा के नाम पर मध्य प्रदेश में शूटिंग रेंज का नामकरण किया जाता है। विज्ञान, चिकित्सा में भी नामी लोग हैं हिमाचल प्रदेश के।

डॉ. अरुण शर्मा से लेकर डॉ. टीएस महंत तक ...ये सब उम्मीदों के पेड़ हैं जिनकी हवाएं भावी पीढ़ी के पुरुषार्थ को थपकी देकर उत्साहित करती रहेंगी। डॉ अरुण देश के पहले ऐसे डॉक्टर है। जिन्होंने कार्डियो वस्कुलर रेडियोलॉजी एंड एंडोवस्कुलर इन्टरवेंशन (सीवीआर एंड ईआई) में सुपर स्पेशेलाइजेशन यानी डीएम डिग्री पाई है। लेकिन कुछ उम्मीदें ऐसी हैं जिनके याद करते ही फानी बदायुंनी भी याद आते हैं। अपने इस शेर के साथ :

कुछ कटी हिम्मत-ए-सवाल में उम्र

कुछ उम्मीद-ए-जवाब में गुजरी

भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड में हिमाचल का हिस्सा, रेल विस्तार, हवाई विस्तार, पौंग बांध विस्थापितों का पुनर्वास और शानन जैसी परियोजनाएं....कब तक छोटे भाई की भूमिका में रहना होगा? छोटे भाई की भूमिका में रहने की एक उम्र, एक अवधि तो होती ही होगी। केंद्रीय मदद की ओर ताकने वाले हिमाचल को यह मदद मिल जाए, उसका अपना हिस्सा मिल जाए तो क्या बागवानी के विस्तार और विस्तीर्ण नहीं हो सकते?

सच यह है कि हिमाचल प्रदेश के लिए साल बदलने का अर्थ केवल कैंलेंडर बदलने से नहीं जुड़ता। हिमाचल प्रदेश अपने आप में विलक्षण अनुभव इसलिए है क्योंकि यह उन मौसमों को जीता है। अटल सुरंग ने एक भरोसा दिलाया है कि उम्मीद बनी रहे तो कभी न कभी पूरी भी होती है।  इससे न केवल लद्दाख और लेह पास आ जाएंगे बल्कि सेना को रसद पहुंचाने व अन्य रणनीतिक संदर्भों में भी मदद मिलेगी।

इसके बाद उम्मीद है शहरी नियोजन में। शिमला पर्यटन की रुत में रेंगने पर विवश हो जाता है। शिमला की जमीन पर पांव धरने की जगह नहीं होती, शिमला को अब हवा में जगह तलाश करनी होगी। स्काई बस की अवधारणा आज बेशक हवा में उड़ा दी जाने वाली बात लगे लेकिन सिकुड़ते शिमला में उसे हवा में ही उडऩा होगा। यह नए मुख्य सचिव को भी देखना है कि राजधानी के संकुचन को कैसे कम किया जाए। यह केंद्रीय मंत्रालय के साथ उठाने वाला मामला है।

कितने भी मौसम बदलें, साल बदलें, हिमाचल का शांतिप्रियता का मूल चरित्र न बदले, यही नए साल में अपनी प्रार्थना है। हिमालय की प्रकृति है कि वह अपनी गोद में सबको जगह देता है। हिमाचल प्रदेश में देश के कई राज्यों के लोग इसीलिए आजीविका कमाने आते हैं कि यहां अपराध उस तरह का नहीं है। यहां लघु बिहार, छोटा झारखंड, छोटा नेपाल, छोटा उत्तर प्रदेश और कहीं-कहीं तो दक्षिण भारत भी है। पूरे देश को जगह देने वाले हिमाचल को भी देश के दिल में जगह मिलनी ही चाहिए।

Posted By: Rajesh Sharma

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