नवनीत शर्मा, धर्मशाला। कुछ बातें प्रतीक रूप में भी हों तो अच्छा संदेश भेजती हैं। प्रतीक क्या हों और संदेश क्या हों, यह निर्भर करता है देशों पर। पाकिस्तान में प्रधानमंत्री बनते ही आर्थिक दुर्दशा से हताश इमरान खान ने प्रधानमंत्री आवास की भैंसें बेच कर धन कमाने का एकांकी किया था। यह वहां के प्रतीक हैं। लेकिन हमारे प्रतीक गरिमापूर्ण हैं। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त में देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा और कहा कि उन्हें मिले सियोल शांति पुरस्कार की राशि यानी एक करोड़ तीन लाख रुपये पर आयकर काटा जाए। प्रधानमंत्री के संदेश को जिस हिस्से ने गरिमा और प्रतिष्ठा प्रदान की, वह यह था कि प्रधानमंत्री भी सामान्य नागरिक की तरह आयकर कटवाना चाहते हैं।

आम और खास के बीच की लगातार चौड़ी होती जा रही विभाजक रेखा को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पहचाना और सितंबर में उनकी सरकार ने फैसला ले लिया कि वेतन पर आयकर की अदायगी मुख्यमंत्री और मंत्री स्वयं करेंगे। यह छोटा फैसला नहीं था। बात निकली और फिर दूर तलक गई तो अपना हिमाचल प्रदेश भी दिखा पड़ोसी उत्तराखंड के साथ...जहां अभी सरकार ही यह जहमत उठाती है। सरकार तो माध्यम है... यह कष्ट जनता उठाती है। बात और दूर तक निकली तो पांच राज्य सामने आए जिनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा भी शामिल हैं।

इन सभी राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्रिगण के वेतन पर आयकर की अदायगी सरकार द्वारा वहन किया जाने वाला खर्च है। सच तो यह है कि भारत में शायद ही ऐसी कोई सरकार हुई हो जिसने माननीयों के भत्ते कम करने का प्रस्ताव लाया हो। इसके बरक्स भत्ते, वेतन और दीगर अखराजात बढ़ाने के लिए संपूर्ण सहमति से प्रयास हुए हैं और जैसी कि अपेक्षा रही है, वे सफल भी हुए हैं।

हिमाचल प्रदेश सरकार के सिर पर पचास हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। चार्वाक की उक्ति ऐसी सूक्ति बन गई है, जिसकी छाया में कई सरकारों ने समय काटा है। सूक्ति का सार यही है कि कर्ज लेकर घी पीएं। हिमाचल प्रदेश में जाहिर है उन अपवादों की बात नहीं ही होगी जिन्होंने समय-समय पर एलान किया कि वे वेतन के रूप में केवल एक रुपया लेंगे।

देश के सामाजिक ढांचे के साथ विचित्र किस्म की जोंक चिपका कर गए मांडा के राजा, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने ही ये इबारत भी खड़ी की थी कि माननीयों का वेतन तो वेतन, उस पर बनने वाला आयकर भी जनता की जेब से जाए। वह जनता जिसके कई चेहरे हैं। जो कर्मचारी है, अधिकारी है, उद्यमी है, स्वरोजगार में लगा है या काम के किसी भी क्षेत्र में लगा है। जिसके लिए आयकर विभाग हर वर्ष एक बड़ी अग्निपरीक्षा है... जिसे उससे गुजरना ही होगा... जो कुछ वर्ष पहले तक हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखता रहा है।

हिमाचल प्रदेश का रुदन वर्षों से आर्थिक तंगी का क्रंदन रहा है। वक्त के साथ यह मंथर सप्तक से तार सप्तक तक पहुंच रहा है। फिजूलखर्च कम करने की सलाहें सतलुज में बह जाती हैं या ब्यास में। इन पर अमल करने के शब्द कलाकक्षीय संभाषणों में गूंजते हैं। लेकिन यह गूंज, स्थाई और मौलिक आवाज नहीं बन पाती। चीजों का दोहराना इसलिए अनिवार्य होता है ताकि वे याद रहें। जहां संपत्ति में अस्सी फीसद वृद्धि दर्ज होती हो, जहां सुविधाओं में कमी न हो, जहां गरीबी की अवधारणा न हो, वहां अपना आयकर स्वयं देने में संकोच कैसा। पानी ऊपर से बहता है...ऐसे में कुछ अधिकारी अगर 15 रुपये की चाय का बिल भी क्लेम करते हैं तो हैरानी क्यों? आम नागरिक भी आयकर दे ही रहा है।

वह कर्तव्यनिष्ठ हो सकता है तो प्रेरणास्रोत क्यों न हों? मोटा अनुमान है कि चार करोड़ रुपये इसी काम में जाते हैं हिमाचल प्रदेश जैसे गरीब राज्य के। चार करोड़ अधिक है या कम है, सवाल वह नहीं है। सवाल यह है कि क्या ये चार करोड़ अस्पतालों में दवाओं के लिए, बच्चों की ऐसी वर्दी के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकते जो छीजती न हो? क्या इस राशि को मुख्यमंत्री राहत कोष में डाल कर प्रदेश के कुछ होठों पर मुस्कान नहीं लाई जा सकती? किसी अंदर की ओर को धंसी हुई आंख में आशा की किरण नहीं भरी जा सकती? सब हो सकता है और संभवत: होगा भी।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने ऐसे संकेत दिए हैं कि मंत्रिमंडल इस पर विचार करेगा। यदि यह हो जाता है तो हाल में उत्तर प्रदेश के बाद हिमाचल ही ऐसा राज्य होगा जहां माननीय की ऐसी आर्थिक सेवा जनता का काम नहीं रहेगा। ये प्रतीक बहुत अनिवार्य हैं क्योंकि ये महज प्रतीक नहीं हैं, समय की मांग है, राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा है, जनता के दरबार में 'पैसा नहीं है' के तर्क का पूरक है। ऐसा होना उस सूत्रवाक्य को साबित करने की ओर पहला कदम जिसके तहत 'राजनीति करियर नहीं, 'राजनीति नहीं जनसेवा' को अधिमान दिया जाता है।

Posted By: Rajesh Sharma

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