नवनीत शर्मा, जेएनएन। यह पारिभाषिक शब्दकोश का ही जलवा है कि चुनाव तो चुनाव की तरह होगा लेकिन नाम उपचुनाव है। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में पच्छाद और कांगड़ा जिले में धर्मशाला विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। किसी के मोहरे गिने-चुने हैं तो किसी को अभी फैसला लेना है कि मोहरे कौन हों इस बिसात के लिए। कांग्रेस की ओर से दोनों विधानसभा क्षेत्रों के लिए नाम लगभग तय हैं, लेकिन सर्वे...सूचियां...आवेदन...आवेदन शुल्क और फिर घोषणा की परंपरा को निभाया जाता है। अब तो हैरानी ही होगी कि अगर कांग्रेस पच्छाद से गंगू राम मुसाफिर और धर्मशाला से सुधीर शर्मा को न उतारे।

चेहरे को लेकर दुविधा किसे कहते हैं, यह इन दिनों कोई कांग्रेस से नहीं, भाजपा से पूछे। प्रदेश में सरकार है, मुख्यमंत्री जयराम की परीक्षा से भी जुड़ा है यह उपचुनाव। स्टार प्रचारक भी ठाकुर जयराम ही होंगे। भाजपा जैसी बड़ी पार्टी में चेहरे भी बड़े हैं और उन बड़े चेहरों से टिकटार्थियों की आस भी जुड़ी हुई है। सबसे पहले तो किशन कपूर...जो सांसद बन चुके हैं और इसीलिए उपचुनाव हो रहा है...वह चाहते रहे हैं कि बंसी से उनके पुत्र के नाम की शाश्वत धुन निकले। लोकतंत्र में ऐसी अपेक्षा अपराध नहीं, किंतु लोकतंत्र कार्यकर्ताओं के लिए भी तो होना और दिखना चाहिए। राजनीतिक प्राप्तियों की सूची लंबी करने का आग्रह लंबी पारी खेल चुके किशन कपूर को अपने प्रति सख्त होकर देना चाहिए। क्योंकि टिकट तो बड़ों-बड़ों के आंसू निकलवा देती है...किशन कपूर के लिए यह रहस्य नहीं है।

दरअसल कई चेहरे हैं जिनके नाम चल रहे हैं। डॉ. राजीव भारद्वाज, राकेश शर्मा जैसे कई नाम हैं। विशाल मुस्कान लेकर सुधीर की मुस्कान को टक्कर देने वाले युवा विशाल नैहरिया भी हैं...। डॉ. भारद्वाज को शांता कुमार का आशीर्वाद भी प्राप्त है। हालांकि शांता कह चुके हैं कि मेरा कोई प्रत्याशी नहीं। एचपीसीए के मैदान पर हर मौसम खेलने वाले संजय भी युद्ध क्षेत्र का हाल देख रहे हैं। उमेश दत्त का टिकट पिछली बार किशन कपूर के आंसुओं में डूब गया था। राज्य अतिथिगृह पीटरहॉफ में हुई बैठक में कुछ नामों पर चर्चा हुई होगी। असली नाम वही होगा जो दिल्ली से लौटेगा। इसी प्रकार से पच्छाद से दयाल प्यारी कश्यप, रीना कश्यप, बलदेव कश्यप और आशीष सिक्टा के नाम गूंज रहे हैं। सिरदर्द का आलम देखें कि भाजपा के शीर्ष नेता कहते हैं..., 'हमें पहले भनक होती कि लोकसभा चुनाव के नतीजे बंपर रहेंगे तो हम न किशन कपूर को छेड़ते, न सुरेश कश्यप को... हमने स्यापा ही नहीं रखणा था।

अब बात उन क्षेत्रों की जहां छोटी जंग होती है। सिरमौर के पच्छाद के पाश्र्व में पीड़ा का आवास है। पवनेंद्र गूंजते हैं...

'उसे दुख धरा का सुनाना पहाड़ो

की अंबर तुम्हारे बहुत पास होगा।'

पच्छाद के नसीब में भौगोलिक हों या सियासी, बहुत से पहाड़ आए, लेकिन विकास नहीं आया। पच्छाद के नसीब में हिमाचल निर्माता...प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री आए...सात बार के विधायक गंगू राम मुसाफिर आए...जो मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष भी रहे...बस सड़कें नहीं आईं। राजगढ़ की पहचान है आड़ू और वीरभद्र इसे पीच वैली ऑफ एशिया भी कहते हैं।

दरअसल कहना आसान होता है इससे स्थानीय जुगाड़ भी प्रबंधित होता है। जैसे राजगढ़ पीच वैली ऑफ एशिया। जैसे झील का जोहड़ में बदलना दर्ज करते खजियार का भारतीय स्विट्जरलैंड हो जाना। डॉ. परमार का मानना था कि वह पूरे हिमाचल के हैं... केवल अपने क्षेत्र का विकास कैसे करवा सकता हूं। आज वहां कच्ची और टूटी-फूटी सड़कों पर उठती धूल में सवाल होता है-'हिमाचल निर्माता... केवल अपने ही क्षेत्र का विकास क्यों नहीं करवाया? डॉ. परमार की तो अपनी संस्कृति थी, इतनी बार के विधायक गंगू राम भी उन रास्तों के मुसाफिर न हो सके? आजादी के दीवाने वैद सूरत सिंह का पझौता आंदोलन क्या अब कोई प्रेरणा नहीं है? किस आधार पर विभिन्न पार्टियां वहां मतों के लिए याचना करने जाती रही हैं? अगर वहां अदालतों के दखल से ही डिग्री कॉलेज मिलने थे... तो कहां थे धरा का दुख अंबर को सुनाने वाले पहाड़?

इधर धर्मशाला के विकास का सबसे बड़ा मोड़ था स्मार्ट सिटी होने की तरफ कदम बढ़ाना। आखिर कितना स्मार्ट हो पाया है धर्मशाला? सुधेड़ के रास्ते से धर्मशाला में प्रवेश करने के साथ जो कचरे का सुलगता हुआ पहाड़ दिखता है, क्या वह धर्मशाला है? सेंट्रल यूनिवर्सिटी पर स्वार्थ की खो-खो प्रतियोगिता के लिए क्या कोई एक पक्ष दोषी है? कहां गए बिजली के स्मार्ट मीटर... मनोरंजन पार्क...टिकट मांगना सबका अधिकार है, लेकिन क्या कभी जनता ने पूछा विधायक बनने के इच्छुक व्यक्ति से कि उसका विजन क्या है?

जाति, संपर्क और दीगर समीकरण भले ही लोकतंत्र के लिए जरूरी अंग बना दिए गए हैं।...अंतत: क्या विकास का एजेंडा ही मूल एजेंडा नहीं होना चाहिए? लेकिन जब सारा मामला ही हैंडपंप लगवाने और तबादलों तक सीमित हो जाए, तब कौन सोचेगा कि धर्मशाला के प्रवेश द्वार वाला मांझी खड्ड पुल जल्द बनकर तैयार हो? किसे ध्यान आना चाहिए कि स्मार्ट सिटी के लिए स्मार्ट सोच का होना भी जरूरी है। क्या यह कोई रहस्य है कि मंत्रिमंडल के दो कद्दावर लोगों की खींचतान का असर धर्मशाला पर हुआ है? किसी को स्मरण है कि तपोवन स्थित विधानसभा भवन में कभी ई-विधान प्रणाली के लिए अकादमी का सपना देखा गया था? किसी ने सवाल भी पूछा? आखिर कब तक लोकसभा चुनाव में मिले मत प्रतिशत को विजन के अभाव की ठंड में तापते रहेंगे?

कोई कश्यप हो या सिक्टा...भारद्वाज हो या शर्मा, दत्त हो अन्यथा कोई और मुसाफिर हो... पच्छाद और धर्मशाला को विकास की जरूरत है। कहीं सुधेड़ का कचरे का पहाड़ साफ होना है, कहीं हिमाचल को बनाने वाले के गांव तक सड़क बननी है। इसीलिए प्रत्याशी कोई भी जीते, जनता का जीतना बहुत जरूरी है। धर्मशाला में नवंबर में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और उनकी टीम ने इन्वेस्टर मीट का आयोजन भी करना है। उपचुनाव के तत्काल बाद यह बड़ा आयोजन इस शहर के खाते में आएगा। उपचुनाव नाम का उपचुनाव है, इसके संदेश जैसे ही होंगे। सत्ता का साथ जीतेगा या विपक्ष का मंतव्य, या फिर सिर्फ जनता, यह परिणाम ही बताएगा। तब तक पच्छाद और धर्मशाला के मतदाता के पास सोचने-समझने का वक्त है।

Posted By: Rajesh Sharma

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