धर्मशाला, नवनीत शर्मा। अमुक राजनेता तो हिमाचल की तकदीर है...! अमुक जी जैसा जन प्रतिनिधि तो भाग्य है हिमाचल का...!  अमुक जी ने फ्लां भवन बनवाया और दीगर ने फ्लां इमारत बनवाई...। ये तमाम बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं लेकिन इनमें आटे में नमक जितना सत्य भी हो तो यह बात बहसतलब नहीं हो सकती। लेकिन तस्वीर का एक पक्ष यह भी है कि राजनीति वाले तो राजनीति करते ही हैं...राजनेता जिनसे काम लेते हैं...वे भी राजनीति के शिकार का शौक रखते हैं। बात नौकरशाही की... अफसरों की... आइएएस की या कह लें...उनकी जो वास्तव में हिमाचल प्रदेश के भाग्य निर्माता हैं।

एक आइएएस अधिकारी अखिल भारतीय परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद इस सेवा में आता है। उसके लिए पूरा देश एक होता है। उसका काम होता है देश की सेवा इस माध्यम से। उसकी कलम बंजर को सींच सकती है, सूखे लबों पर मुस्कान ला सकती है लेकिन शर्त एक ही है कि अगर वह चाहे तो। अगर वह न चाहे और रणनीतिक या राजनीतिक शतरंज का शौक विरोधी मोहरों को गिराने में करने लगे... विभाजन का शिकार होने लगे तो वह अपनी विभागीय प्राथमिकताओं को कब और कैसे निभाएगा?

हिमाचल का मंजर यह है कि पहले आइएएस अधिकारियों का एक वॉट्सएप ग्रुप था... उसका नाम था 'आइएएस एचपी।' उसके बाद एक ग्रुप और बना जिसका नाम है 'हिमाचल आइएएस आरआर।' यहां आरआर का मतलब है रेगुलर रिक्रूट। यानी एक विभाजन यह हुआ कि एक वे जो हिमाचल प्रशासनिक सेवाओं से पदोन्नति के बाद आइएएस में आए हैं और दूसरे वे जो सीधे आइएएस में आए हैं। जैसे हिमाचल प्रदेश संसाधनों और विकास के मामले में एक बेहद खुशहाल हो, जिसके सामने कोई चुनौती न हो...इसलिए आला अफसरों के पास यह बंटना खेल हो गया। क्योंकि प्राथमिकताएं कुछ और हैं, इसलिए अंदरूनी अफसर और बाहरी अफसर का विवाद भी छिड़ता आ रहा है।

तीसरा पक्ष यह हुआ कि अफसरों की पहचान आसान हो गई कि 'कौन कहां' है? यानी किसकी निष्ठा किसके साथ है। वीरभद्र सिंह के समय भी यह पहचान हो गई, शांता कुमार के समय भी, प्रेम कुमार धूमल के वक्त भी और अब भी साफ है कि कौन कहां है। जो सत्ता के आसपास नहीं होता.... होना चाहता है पर हो नहीं पाता... उसे फिर यह सब सोचना पड़ता है कि अंदरूनी और बाहरी यानी हिमाचली और गैर हिमाचली के बिंदु से सिंधु की तलाश हो, एक दूसरे को कैसे गुरुत्व के केंद्र से दूर रखा जाए? कौन अंत:पुर तक न पहुंच सके? कौन अधिक विश्वासी साबित न हो...।

जहां चर्चा यह होनी चाहिए कि विकास कैसे हो, समाज की अंतिम पंक्ति तक खड़े व्यक्ति को शासन-प्रशासन का स्पर्श कैसे मिले, वहां चर्चा और परिचर्चा इस बात पर होती है कि दूसरे का रक्तचाप कैसे बढ़ाया जाए। अगर अतिरिक्त मुख्य सचिव पद पर तैनात व्यक्ति मंत्रिमंडल की बैठक में रोने पर विवश हो जाए तो समझा जा सकता है कि स्थितियां क्या हैं। उनका आक्रोश यह था कि उन्हें बिना बताए एजेंडा नोट के हिस्से में परिवर्तन कर दिया गया। लेकिन दस्तखत उन्हीं के रहे।

तथ्य यह भी है कि मुख्य सचिव कैबिनेट के सचिव भी हैं। उनके पास अधिकार है नोट को बदलने का। लेकिन अतिरिक्त मुख्य सचिव भी इसलिए ठीक हैं क्योंकि नोट अगर बदला गया तो उनकी जानकारी में तो रहता। किसके पास अधिकार है और किसके पास नहीं, इस प्रकरण से यह बहस खत्म हो गई। निष्कर्ष यह है कि विश्वास का संकट तो साफ दिख रहा है। इसका अर्थ है कि बहुत कुछ ऐसा होता आया होगा... हुआ होगा...हो रहा होगा...और आगे होने की संभावना भी होगी। कुछ ऐसा जो विश्वास के घाटे को साबित और पुख्ता करता हो।

इस परिदृश्य में जब ध्यान संसाधनों के दोहन पर होना चाहिए, जब बात चिकित्सकों की कमी को पूरा करने पर होनी चाहिए, जब आम आदमी की जेब से लेकर पेट और सिर तक की चिंता होनी चाहिए... अगर अधिकारियों के पास अपनी ही चिंताएं होंगी तो न राजनेताओं की लोकप्रियता अक्षुण्ण रहेगी और न राजनेता वे परिणाम ही दे पाएंगे जो जनता को चाहिए।

मुख्य सचिव एक माह बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं। केंद्र के ताप से मुक्ति लेकर अनिल खाची पहाड़ों की ठंड में वापस आ गए हैं। अगर वह मुख्य सचिव बनते हैं तो वह कई वरिष्ठ अफसरों की सेवानिवृत्ति के बाद ही सेवानिवृत्त होंगे क्योंकि उनकी अवधि लंबी होगी...वह 22 की उम्र में सेवा में आ गए थे। हालांकि पायदान कई सरकारों ने इधर-उधर किए हैं...इसलिए कुछ भी कहा नहीं जा सकता। लेकिन उनके आने से कई कुछ बदलने की संभावना तो है ही। 

आज अफसरों के लिए नाटियों के माध्यम से प्रसिद्ध होना आसान है...यह भी जरूरी है...माध्यम है। लेकिन काश, सड़कें, पानी और विकास के दीगर मुद्दों को हल करने के बाद कोई प्रसिद्ध हो तो बात बने। नौकरशाही की सिसकियां नहीं रुकीं तो असर सब पर होगा। शासितों पर भी और शासकों पर भी।

Posted By: Rajesh Sharma

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