नवनीत शर्मा, धर्मशाला। होश की खूबी यह है कि वह कभी न कभी ठिकाने आती ही है। कल तक बेटियों को अयाचित अथवा अनचाही फसल समझने वाले अब समझ रहे हैं कि उनका अपना नाम किसके नूर से चमक रहा है...जान रहे हैं कि बेटी  शब्द अब लाचारी और बोझ जैसे शब्दों का पर्याय न होकर स्वावलंबी युग का सूत्रपात हो गया है। अब इशरत आफरीं के इस शे'र का मतलब बेटियों के हक में ही निकलता है:

एक ने बेटी, एक ने बेटा जन्म दिया

कितना फर्क है हम दोनों की मांओं में

खासतौर पर हिमाचल प्रदेश में हर परीक्षा परिणाम यह साबित कर रहा है कि बेटियां बच गई थीं तो कई कुछ बचा भी रही हैं। हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवाओं का नतीजा हाल में निकला है। पहले चार स्थानों पर बेटियां हैं। मेडिकल कॉलेजों का दीक्षा समारोह हो, हिमाचल प्रदेश के  विश्वविद्यालयों के दीक्षा समारोह हों, बोर्ड की परीक्षाओं के परिणाम हों....हर जगह वे पिता और मां की खुशी से नम आंखों का कारण बनी हैं। ये वही बेटियां हैं जो किसी लालची चिकित्सक, किसी भ्रूण हत्यारे नर्सिंग होम की दीवारों से बच गईं थी...ये वे बेटियां हैं जो उस सोच के क्रूर पंजों से दूर रहीं जिसके तहत बेटी होने का अर्थ शोकाकुल होने से जुड़ता है। ये बेटियां जवाब हैं उन लोगों के लिए जिनका सारा ज्ञान वंश परंपरा और कुल दीपक की तलाश में बेटियों के जीवन में अंधेरा भर देता रहा है। जो लोग आदर्शविहीनता का जार-जार रोना रोते हैं, उनके लिए ये जिंदा मिसाल हैं। अब तो तस्लीम कर लीजिए साहब। सत्य भी यही है और तथ्य भी।

बहरहाल, इस हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवाएं परीक्षा यानी एचएएस में शीर्ष पर रही हैं अपराजिता चंदेल। पिता चीफ फार्मासिस्ट और मां नर्स। सपना बड़ा था तो कोशिशों के साथ नीयत और आत्मविश्वास भी कम नहीं था। इसीलिए नतीजा उसे इस काबिल बना गया कि वह नौकरशाही में शामिल हो गई। अब वह चाहे तो प्रदेश के लिए नई राहें खोल सकती है। उसके बाद के नाम भी संयोगवश ऐसे हैं जिनके साथ कोई न कोई संदर्भ जुड़ा है। स्वाति.. प्रिया और फिर स्वाति...। दोनों स्वातियों ने अपने नक्षत्र स्वयं बनाए और प्रिया तो यकीनन अभिभावकों की प्रिया ही होगी।

बीते कुछ वर्षों में ये परिवर्तन अकारण या अचानक नहीं आया है। लिंगानुपात में हिमाचल प्रदेश बेशक अब भी केरल से बहुत दूर है, पुड््डुचेरी, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से भी पीछे है और छत्तीसगढ़ से भी नजदीक नहीं है। बस एक सोच बनी है कि बेटियों की पूजा बहुत हो गई। बहुत देवी बना लिया उन्हें। अब उन्हें इंसान होने दें। बेशक लिंगानुपात की दृष्टि से देश के सौ शर्मनाक जिलों में हिमाचल प्रदेश का ऊना जिला शामिल है लेकिन वह भी 845 से 916 पर पहुंच रहा है। हिमाचल प्रदेश में तुलनात्मक रूप से बेहतर जिला मंडी है जो ताजा आंकड़ों के मुताबिक 987 पर है। हिमाचल का लिंगानुपात फरवरी 2018 तक 943 है। जो राष्ट्रीय लिंगानुपात से बेहतर है लेकिन कई राज्यों से अब भी दूर है। इसके बावजूद चेतना का स्तर बढ़ रहा है यह अच्छी बात है।

आलम यह है कि यहां की लोक परंपरा भी महिलाओं को देवी तो बनाती रही लेकिन उसे इंसान नहीं समझा गया। संयोगवश चैत्र मास के आरंभ में ढोलरू गायक घर-घर जाकर चैत्र मास का नाम सुनाते हैं। इसी परंपरा में 'रुल्हा दी कुल्ह लोकगाथा भी सुनाई जाती है। पानी नहीं आता था तो राजा को सपना आया कि उसके घर से किसी की बली चाहिए। राजा के लिए सब परिजन प्रिय थे इसलिए अंतत: उसने अपनी पुत्रवधु की बली देने का मन बनाया। कांगड़ा जिला के चड़ी क्षेत्र की यह गाथा बताई जाती है। ऐसा ही संदर्भ सदियों पुराने शहर चंबा में भी मिलता है जहां वर्मन राजघराने की बहू रानी सुनयना को दीवार में चिनवाया गया ताकि प्रजा को पानी मिल सके। दोनों गाथाएं इतनी मार्मिक हैं कि चड़ी और चंबा के पानी का तो पता नहीं, सुनने वाले की आंखों से अवश्य ही नारी विमर्श बूंद बन कर छलकने लगता है। वे दौर जा चुके हैं...जमाना बदल गया है। अब बहू हो या बेटी... उसके राजनीति, खेल, विज्ञान, कला, साहित्य और नौकरशाही में अपने स्थान हैं। अभिभावकों के प्रति करुणा और समाज के प्रति संजीदगी का सोता कतई नहीं सूखा है। सफलता ने परिवेश के प्रति उन्हें बेहिस नहीं बनाया है। बेटियां अपना जीवन खुद लिख रही हैं...ऐसे में शायान कुरैशी के शब्द स्वत: साकार हो रहे हैं :

मुझको बख्शी खुदा ने इक बेटी

चांद आंगन में इक उतर आया

 उम्मीद बेमानी नहीं है कि आने वाला दौर सफलता के और आयाम छूने का अवसर देगा। बस इस बात का ध्यान अवश्य ही रखा जाना चाहिए कि अब भी कुछ नवजात बेटियां या भ्रूण झाडिय़ों में जो लोग रख जाते हैं... अस्पतालों के विभिन्न हिस्सों में जीवन की संभावनाओं को खत्म कर देते हैं, उन्हें भी होश आनी चाहिए। बेटी तो वरदान है, कपड़ा, लत्ता या दान नहीं है।

Posted By: Rajesh Sharma

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