ऊना, राजेश डढवाल।

Independence Day 2022, आजादी...सिर्फ शब्द नहीं, अहसास है। बचपन भले ही अंग्रेजी हुकूमत की छाया तले बीता मगर जवानी में सांस आजाद भारत में ली। 25 साल की उम्र में भारत को आजाद होते देखा। आज 100 साल का होने पर आजादी के अमृत महोत्सव में शामिल होकर उत्सव मनाने का मौका मिला। स्वतंत्रता दिवस पर आज पूरा देश उत्सव मना रहा है।

वहीं, ऊना जिला के हरोली विधानसभा क्षेत्र के कांटे गांव निवासी प्रीतम सिंह भी आज अपनी 100वीं जन्मतिथि पर खुश हैं कि उन्होंने देश के आजाद होने से लेकर आजादी के अमृत महोत्सव तक के सफर को जिया है।

प्रीतम सिंह कहते हैं, 15 अगस्त 1922 को जन्म हुआ। प्राथमिक शिक्षा ऊना से हासिल की। एजी कार्यालय लाहौर में क्लर्क की नौकरी मिली। अंग्रेजी हुकूमत में दिन जैसे-तैसे कट रहे थे। जुलाई, 1947 में हालात खराब होने लगे। कार्यालय की तरफ से आदेश हुआ कि अपना सामान बांधकर यहां से सुरक्षित स्थान की ओर चले जाएं। चार दिन पैदल भी चला। रास्ते मे कई लोग साथ थे।

कुछ लोग जो अपनों के साथ थे, वे खुश थे...कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपनों को खो दिया था...उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। दिल्ली पहुंचने पर राहत की सांस ली। आठ अगस्त 1947 को मेरी शादी हो गई। 14 अगस्त 1947 की वो शाम आज भी याद है। सैन्य छावनियों, सरकारी कार्यालयों, निजी मकानों आदि पर फहराते यूनियन जैक (ब्रिटिश झंडा) को उतारा जाना शुरू हो चुका था। 14 अगस्त को जब सूर्य डूबा तो देशभर में यूनियन जैक ने ध्वज-दंड का त्याग कर दिया, ताकि वह इतिहास बनकर रह जाए। स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए आधी रात को सरकारी भवन पूरी तरह तैयार थे। जिन कक्षों में भारत के वायसरायों की भव्य आयल पेंटिंग्स लगी रहा करती थीं, वहां अब तिरंगे झंडे शान से लहरा रहे थे।

15 अगस्त की सुबह से ही देशभर में जश्न शुरू हो गया था। लोग घरों से निकल पड़े। कई लोग साइकिल, कार, बस, रिक्शा, तांगा, बैलगाड़ी, यहां तक कि हाथी-घोड़ों पर भी सवार होकर दिल्ली के केंद्र यानी इंडिया गेट की ओर चल पड़े। लोग नाच-गा रहे थे...एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। हर तरफ राष्ट्रगान की धुन सुनाई दे रही थी। चारों दिशाओं से लोग दिल्ली की ओर दौड़े चले आ रहे थे। तांगों के पीछे तांगे, बैलगाडिय़ों के पीछे बैलगाडिय़ां, कारें, ट्रक, रेलगाडिय़ां, बसें... सब लोगों को दिल्ली ला रही थीं। लोग वाहनों की छतों पर बैठकर आए, खिड़कियों पर लटककर आए, साइकिल, घोड़ों पर आए और पैदल भी। दूर देहात के ऐसे लोग भी आए जिन्हें गुमान तक नहीं था कि भारत देश पर अब तक अंग्रेजों का शासन था और अब नहीं है। मर्दों ने नई पगडिय़ां पहनीं, औरतों ने नई साडिय़ां। बच्चे मां-बाप के कंधों पर लटक गए। देहात से आए कई लोग पूछ रहे थे कि यह धूम-धड़ाका क्यों है? इस पर लोग बता रहे थे, अरे... आपको नहीं मालूम, अंग्रेज जा रहे हैं। आज नेहरू जी देश का झंडा फहराएंगे। हम आजाद हो गए। आजादी का जश्न आज भी जहन में है।

देश ने आजादी के 75 साल में बहुत तरक्की की है। इन आंखों ने विकास का जो सफर देखा, उम्मीद है वह यूं ही जारी रहेगा।

शिमला में की शिक्षक की नौकरी

प्रीतम सिंह लाहौर से दिल्ली पहुंचने के बाद शिमला गए। उन्होंने वहां बैचलर आफ टीचिंग कर शिक्षक की नौकरी की। उनके दो बेटे हैं। इनमें से एक जल शक्ति विभाग जबकि दूसरे पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त है। स्वतंत्रता दिवस पर आज उन्होंने अपनी जन्मतिथि स्वजन के साथ धूमधाम के साथ मनाई। प्रीतम सिंह में आज 100 साल का होने पर देशभक्ति और देशप्रेम की भावना पहले की तरह मजबूत है।

उम्र का शतक लगा चुके प्रीतम सिंह को जन्मतिथि पर सम्मान देने पहुंचे उनके पूर्व छात्र

प्रीतम जी के छात्र रहे विख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जगदीश्वर कंवर उन्हे बधाई देते हुए

एक ओर भारत आजादी की 75वीं वर्षगांठ के अमृत महोत्सव को मना रहा था तो वहीं दूसरी ओर उम्र के शतकीय पड़ाव को पार कर चुके प्रीतम सिंह के होनहार शिष्य उनकी जन्मतिथि पर बधाई देने पहुंचे थे। बधाई देने वाले इनके शिष्यों में जिले की बड़ी नामचीन हस्तियां शामिल थीं। देश और विदेश में अपनी क्षमता का लोहा मनवाने वाले हजारों की संख्या में उनके शिष्यों ने उन्हें विभिन्न माध्यमों से बधाई संदेश दिया।

सरदार प्रीतम सिंह की 100वीं जन्मतिथि को उनके निवास स्थान कांटे में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया। अपने शिष्यों की सफलता और स्नेह को देख वह बड़े प्रसन्न हुए और लंबी आयु का आशीर्वाद दिया। उनके शिष्यों ने अपने गुरूजी को स्मृति चिन्ह व शाल भेंटकर सम्मानित किया। कोई चंडीगढ़ से तो कोई आगरा से तो कोई दिल्ली से पहुंचा। सरदार प्रीतम सिंह से शिक्षा हासिल करके उच्च पदों से सेवानिवृत्त हुए उनके स्टूडेंट्स जब सालों बाद इकठ्ठे हुए तो स्कूल के दिनों की यादें ताजा हो गई। सभी ने पढ़ाई के साथ-साथ उनकी कड़ाई को भी याद किया। शिष्यों का यही कहना था कि अगर उस समय आप न होते तो हम आज इतने बड़े पदों पर न होते।

ग्रेजुएशन करने के बाद ही इन्हें एजी कार्यालय लाहौर में क्लर्क के रूप में पहली सरकारी नौकरी मिली। तब इन्हें मात्र आठ रुपये पगार मिलती थी। देश के बंटबारे के बाद इन्होंने एजी आफिस शिमला में 1952 तक सेवाएं दी, लेकिन इनका सपना एक अध्यापक बनने का था तो इन्होंने क्लर्क की नौकरी छोड़कर बीटी की डिग्री प्राप्त की, एक साल की डिग्री पूरी होते ही इन्होंने वर्ष 1953 में बतौर अध्यापक पूबोवाल के निजी स्कूल में ज्वाइनिंग की। बतौर शिक्षक बेहतरीन सेवाएं देने के बाद ये प्रिंसिपल बने और राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला सलोह से सेवानिवृत्त हुए।

Edited By: Virender Kumar