शिमला, राज्‍य ब्‍यूरो। Cloud Burst In Himachal Pradesh, बादलों को राह में गर्म हवा और पर्वत पसंद नहीं है। रास्ते में कोई बाधा आती है तो ये फट जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में बरसात के दौरान भौगोलिक परिस्थिति व जलवायु परिवर्तन ऐसी घटनाओं को बढ़ा रही है। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और गर्म होती हवा इसका बड़ा कारण है। क्षेत्र में स्थापित जल विद्युत परियोजनाओं का भी असर पड़ रहा है। हिमाचल में हर साल मानसून के समय आर्द्रता के साथ बादल उत्तर की ओर बढ़ते हैं। लिहाजा हिमालय पर्वत बड़े अवरोधक के रूप में सामने पड़ता है। जब कोई गर्म हवा का झोंका ऐसे बादल से टकराता है, तब उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है। राज्य के कुल्लू, शिमला, मंडी व किन्नौर व कांगड़ा जिला में ऐसी घटनाएं सबसे ज्यादा हो रही है।   

क्या है बादल फटना

बादल फटना वर्षा की एक्सट्रीम फार्म है। इसे मेघ विस्फोट या मूसलधार वर्षा भी कहते हैं।  मौसम विज्ञानियों के अनुसार जब बादल भारी मात्रा में आद्र्रता यानी पानी लेकर चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है तब वे अचानक फट पड़ते हैं। यानी संघनन बहुत तेजी से होता है। इस स्थिति में एक सीमित क्षेत्र में कई लाख लीटर पानी एक साथ पृथ्वी पर गिरता है। इसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है।  इस दौरान वर्षा लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटा की दर से होती है।

गर्जने वाले बादल ज्यादा खतरनाक

निचाई वाले यानी क्योमलानिंबस (गर्जने वाले वाले काले व रूई जैसे) वाले बादल ही फटते हैं। हर वर्ष बरसात में हिमालयी क्षेत्र में मूसलधार वर्षा से तबाही मचाने वाले बादल लगभग तीन हजार किलोमीटर का सफर तय कर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से पहुंचते हैं।

कोई अर्ली अलार्म सिस्टम अभी नहीं

प्रदेश में अभी तक आपदा को लेकर कोई अलार्म सिस्टम नहीं है। बादल फटने और उसके बाद होने वाली तबाही में केवल लोगों को अस्पताल पहुंचाने और राहत के तौर पर नाममात्र राशि का प्रविधान है। कृषकों और बागवानों को मिलने वाली मुआवजा राशि को बढ़ाने के लिए विधानसभा में हर बार चर्चा होती है, लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकलता।  

हिमाचल को हर साल 1000 करोड़ का नुकसान

हिमाचल में बरसात हर वर्ष कहर बरपाती है। औसतन एक हजार करोड़ का नुकसान हो जाता है। बादल फटने की घटनाओं से ही 300 से 400 करोड़ का नुकसान होता है। बीते वर्ष कुल 1500 करोड़ का नुकसान आंका गया। केंद्र सरकार को इसकी रिपोर्ट भेजी गई। केंद्रीय राहत दल हिमाचल भी आया, हिमाचल में इस दल ने लोगों से भी बात की। नुकसान की रिपोर्ट भी ली, मगर केंद्र भरपाई नहीं कर पाया।

बादल फटने के प्रमुख कारण

  • बादलों के रास्ते में अवरोध पहाड़ और गर्म हवा।
  • हरित पट्टी के लगातार घटना।
  • जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए पेड़ों का कटान।
  • शहरीकरण का बढऩा, जिससे तापमान बढ़ रहा है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए जंगलों पर दबाव।
  • बरसात के दौरान गर्म हवा क्षेत्र विशेष में बादल फटने का कारण बनती है।

पहली घटना 1970 हुई रिकार्ड

वैसे तो प्रदेश में बादल पहले भी फटते रहे हैं, लेकिन पहली बार 1970 में वैज्ञानिक आधार पर इसे रिकार्ड में किया गय। मंडी जिलों के बरोट में एक मिनट में 38.10 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई। शिमला जिला के चिडग़ांव में 15 अगस्त, 1997 को बादल फटने की घटना से 1500 लोग हताहत हुए थे। हर वर्ष ऐसी पांच से छह घटनाएं होती हैं।

अर्ली अलार्म सिस्‍टम की आवश्‍यकता

मौसम विभाग के निदेशक सुरेंद्र पाल का कहना है पहाड़ पर बादल इसलिए ज्यादा फटते हैं क्योंकि बादलों को रास्ता नहीं मिलता और टकरा जाते हैं। अर्ली अलार्म सिस्टम की आवश्यकता है। हर वर्ष लाखों रुपये का नुकसान होता है।

विज्ञानी यह बता रहे मूल कारण

जलवायु परिवर्तन केंद्र राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के प्रधान विज्ञानी एसएस रंधावा का कहना है जलवायु परिवर्तन का असर और भौगोलिक स्थितियों के कारण इस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही हैं। जब बादलों को रास्ता नहीं मिलता या कई बादल आपस में टकरा जाते हैं तब भी ऐसी घटना होती है।

बाढ़ से नुकसान पर मुआवजे के नाम पर कुछ नहीं

प्रधान सचिव राजस्‍व ओंकार शर्मा का कहना है आपदा राहत में मृतक के स्वजन को चार लाख रुपये राहत राशि का प्रविधान है। जबकि अचानक आई आढ़ के कारण मुआवजे के नाम पर कुछ भी नहीं है। जमीन का नुकसान होने पर राहत मैनुअल के तहत पांच हजार रुपये बीघा तक का प्रविधान है, जबकि मकान के नुकसान पर लाखों या करोडों का नुकसान होता है तो एक लाख रुपये तक का प्रविधान है।

इस कारण आती है बाढ़

एक सीमित क्षेत्र में कई लाख लीटर पानी एक साथ पृथ्वी पर गिरता है, जिसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है। इस पानी के रास्ते में आने वाली हर वस्तु क्षतिग्रस्त हो जाती है। जब कोई गर्म हवा का झोंका ऐसे बादल से टकराता है, तब भी उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है।

इस तरह कम किया जा सकता है नुकसान

राज्‍य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेशक सुदेश मोख्‍टा का कहना है हिमाचल प्रदेश में हर साल बादल फटने की घटनाएं हो रही हैं। इसके कारण नुकसान भी काफी हो रहा है। नुकसान को टालने के लिए लोगों को ढलान वाली कच्‍ची जगह पर मकान बनाने से परहेज करना चाहिए। ढलान वाली जगह मजबूत होने पर ही निर्माण किया जाना चाहिए। इसके अलावा नदी नालों से दूरी बनानी चा‍हिए।

Edited By: Rajesh Kumar Sharma