भारतीय संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जिसमें मनुष्य जितना अपना हित चाहता है उतना ही सार्वजनिक हित की बात भी करता है या उतना ही सार्वजनिक हित चाहने की सोच भी रखता है। आजकल आधुनिकता के दौर में भागमभाग की सोच में जीवन मूल्यों का पतन होता जा रहा है। अब मनुष्य को चाहिए तो सिर्फ और सिर्फ धन। वह धन से ही और उसकी सफलताओं से ही जीवन के मूल्यों का आकलन करता है परंतु यह विषय कुछ और है। यहां विषय है कि हम सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा के लिए क्या करते हैं? यदि हम सार्वजनिक कर्तव्यों की बात करें तो इसमें सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना सर्वोपरि है। यह हमारे संस्कार भी होने चाहिए कि हम सामाजिक व्यवहार में शिष्टाचार व संस्कारों को कभी न भूलें। ये हमारे संस्कार ही हैं कि हम सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा निजी संपत्ति की तरह करें। यहां इस बात का उल्लेख करना अनिवार्य हो जाता है कि इंसान के पतन में कुछ देर नहीं लगती। यदि वह शिष्टाचार व संस्कारों की रक्षा स्वयं नहीं करता तो उसका पतन होना स्वभाविक है। मनुष्य स्वभाविक रूप से विवेकी व बुद्धिशाली जीव है लेकिन जब सार्वजनिक संपत्ति की बात आती है तब उसके विचार वे नहीं रहते जो उसकी निजी संपत्ति को लेकर होते हैं। अब देखिए सरकार तो बहुत से पार्क, सुंदर बाग-बगीचे, सड़क व अन्य संपत्तियों का निर्माण करवाती है परंतु वह संपत्ति या जिनके लिए भी हैं, उनके खुद के विचार उस संपत्ति के रखरखाव, उसकी संभाल व उसकी ठीक से चिता कोई नहीं करता है। हम अक्सर देखते हैं कि किसी भी विरोध के नाम पर सबसे पहले सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाया जाता है और नुकसान पहुंचाया जाता है। जबकि मूल कर्तव्य में कहा गया है कि हमें हर हाल में सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना है और हिसा से दूर रहना है। यदि कोई सार्वजनिक संपत्ति जैसे बस व इमारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है तो उसे रोकना चाहिए। आधुनिक परिवेश में तो देखने को मिलता है कि कोई सार्वजनिक संपत्ति की किसी प्रकार से कोई चिता ही नहीं करता और यदि कोई सार्वजनिक संपत्ति को कोई हानि पहुंचा भी रहा है तो उसे रोकता भी नहीं है और यह निंदनीय है। यदि हम स्वयं को शिक्षित व आधुनिक समझते हैं तो सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा का पाठ हमारी संस्कृति के अनुरूप जैसे वह युगों से चली आ रही है ठीक वैसे ही पढ़ाना चाहिए, जैसा हम लोगों को जीवन में उन्नति करने के लिए पढ़ाते हैं। सभी माता-पिता व गुरुजनों का यह कर्तव्य है कि वे विद्यार्थियों को स्वयं भी इस प्रकार के शिक्षा दें कि हमें सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक वस्तुओं की सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा उसी तरह करनी है जैसे हम निजी संपत्ति की सुरक्षा करते हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते तो नैतिकता व शिष्टाचार की बातें जो हम विद्यालयों, महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों में करते हैं, उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता है। यदि हम घर में अपनी वस्तुओं की सुरक्षा करते हैं और माता-पिता यह कहते हैं कि बच्चो इस वस्तु को ऐसे प्रयोग करो, इस वस्तु को ऐसे संभाल के रखो, उसी प्रकार की शिक्षा सभी माता-पिता को बच्चों को सार्वजनिक संपत्ति के विषय में भी देनी चाहिए। यहां हम सबका यह कर्तव्य है विशेषत अध्यापक वर्ग, माता-पिता व समाज के सभी विशिष्ट जनों का यह परम कर्तव्य है कि हम युवा पीढ़ी में ऐसी शिक्षा दें, जिससे अच्छे संस्कारों का निर्माण हो सके। यदि समाज में अच्छे संस्कारों का निर्माण होगा, तभी उन्नत समाज होगा।

-जयदेव शर्मा, प्रधानाचार्य, डीएवी स्कूल गोहजू

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