धर्मशाला, जेएनएन। विधायक जनता का प्रतिनिधि होता है। पढ़ी-लिखी जनता उसे चुनकर भेजती है। विधायक दो तरह के होते हैं, सरकारी और गैर सरकारी। सरकारी विधायकों की संरक्षक सरकार होती है तो गैर सरकारी विधायकों की संरक्षक विधानसभा। सरकारी विधायकों में मुख्यमंत्री, मंत्री, चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, चीफ व्हिप व नेता विपक्ष इत्यादि आते हैं। इनके लिए सरकार की ओर से गाड़ी, चालक, कार्यालय व स्टाफ इत्यादि सब निशुल्क मिलता है।

गैर सरकारी विधायकों को गाड़ी, चालक, पेट्रोल, कार्यालय व स्टाफ का खर्च जेब से करना पड़ता है। वेतन व भत्ते ही होते हैं, जिनसे गैर सरकारी विधायक खर्च चलाते हैं। हिमाचल निर्माता डॉ. वाईएस परमार ने इसलिए वेतन-भत्तों का प्रावधान किया था ताकि विधायक ठीक से जीवनयापन कर सकें। उन्होंने इसकी जरूरत एक पूर्व विधायक को सड़क किनारे रोड़ी कूटते देखने पर समझी थी। उसके बाद वेतन-भत्तों संबंधी कानून बनाया था।

हिमाचल सहित पूरे देश में विधायक बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता तय नहीं है। कोई भी चुनाव लड़कर जनता का विश्वास जीत विधायक बन सकता है। अशिक्षित भी कई बार विधानसभा पहुंच जाते हैं। शिक्षित वर्ग ही उन्हें चुनकर भेजता है। कम पढ़े-लिखे लोगों को चुनकर विधायक बनाने से पहले मतदाता उसका अध्ययन करते हैं। जब कोई आम परिवार से विधायक बनता है तो जनता को उससे बड़ी उम्मीदें होती हैं। उन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए विधायक को कई बार अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है। उसका असली इम्तिहान पांच साल बाद जनता के दरबार में होता है, जब वह दोबारा चुनाव लड़ता है। पांच साल बाद परीक्षा में पास होकर ही वह जनता का प्रतिनिधि बन सकता है।

जब कोई विधायक समाज का प्रतिनिधित्व करता है तो उस पर समाज की नजर रहती है। जनता की दृष्टि और राय कई बार विधायक के बारे में अच्छी नहीं होती। जनता की सोच रहती है कि अब विधायक के पास धन की कोई कमी नहीं होगी। वह खूब चल-अचल संपत्ति अर्जित करेगा। मैं इसलिए ही विधायकों के जीवन को पूरी तरह पारदर्शी होने के हक में हूं। विधायिका में पारदर्शिता होना जरूरी भी है। इसलिए विधायकों को हर साल अपनी संपत्ति व देनदारियां सार्वजनिक करने के साथ आय के स्रोत भी बताने चाहिए। जब कोई पहली बार विधायक बनता है तो शपथ पत्र में उसकी सारी चल-अचल संपत्ति होती है। उसके बाद उसे हर साल संपत्ति व आय के स्रोत बताने चाहिएं। क्या खरीदा, क्या नहीं, कैसे खरीदा, धन कहां से आया। विधायक खुद आगे आकर संपत्ति जगजाहिर करें तो उनका समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा। जो विधायक संपत्ति सार्वजनिक करने से मना करे, उसे विधायक का चुनाव दोबारा लडऩे से रोक देना चाहिए।

बीते दिनों विधानसभा में वेतन, भत्ते बढ़ोतरी संबंधी संशोधन विधेयक पर विधायकों ने अपनी राय रखी। इस तरह के विधेयक पर कभी चर्चा होती ही नहीं हुई थी। इसमें विधायकों ने अपने खर्च का भी विस्तार से जिक्र किया। सरकार ने यात्रा भत्ता बढ़ाने की घोषणा की, जो प्रदेश की सीमा से बाहर मिलना है। इसका विधायकों को कोई सीधा लाभ नहीं होता। बहुत कम विधायक इसे क्लेम करते हैं। उनके वेतन और भत्तों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। विधायकों ने मांग रखी कि जब उनका पद मुख्य सचिव से ऊपर है तो वेतन कम क्यों। प्रदेश में युवा बेरोजगारों और कर्मचारियों की संख्या काफी ज्यादा है। युवाओं ने यात्रा भत्ता बढ़ाने का विरोध किया। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि यात्रा भत्ता बढऩे से सरकारी कोष पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पडऩे वाला, क्योंकि 90 फीसद से ज्यादा विधायक इस भत्ते का लाभ उठाते ही नहीं।

लोगों में आम धारणा है कि डॉक्टर, इंजीनियर बनना मुश्किल है और विधायक बनना आसान। अनपढ़, पढ़े-लिखे चाहे वह डॉक्टर हो या इंजीनियर सभी को चुनाव लडऩे का अधिकार है। सभी किस्मत आजमा सकते हैं। हिमाचल मेंहर विधानसभा क्षेत्र में साक्षरता दर 80 प्रतिशत से ऊपर है। साक्षर समाज उसे ही चुनकर भेजता है। जैसे डॉक्टर, इंजीनियर पढ़े-लिखे होते हैं, वैसे ही अधिकांश विधायक भी उच्च शिक्षित होते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर व अन्य नौकरी पेशा लोग एक बार टेस्ट कर नौकरी पा लेते हैं, जबकि विधायकों को जनता की अदालत में हर पांच साल बाद परीक्षा देनी पड़ती है। साक्षर जनता दोबारा उनका चयन करती है। हमारे लोकतंत्र में सबके लिए समान अवसर हैं। समाज के पास जैसे विधायिका पर अंगुली उठाने का अधिकार है, वैसे ही चुनाव लडऩे का भी अधिकार है। चुनाव जीतने के बाद जब विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र का दौरा करता है तो उसके सामने कई कठिनाइयां आती हैं।

सबसे पहले तो उसके पास उस तरह की गाड़ी नहीं होती जो गड्ढों, नालों और दुर्गम क्षेत्र में चल सके। ऐसी गाड़ी खरीदने के लिए वह विधानसभा से चार प्रतिशत ब्याज पर लोन लेता है। उसकी किस्त हर महीने कम से कम पच्चीस हजार रुपये बैठती है। विधायक चाहे खुद कितनी भी अच्छी गाड़ी चलाना जानता हो, लेकिन विभिन्न परिस्थितियों के मद्देनजर ज्यादा वाहन नहीं चला सकता। क्योंकि, कम से कम उसका सफर पांच हजार किलोमीटर हर महीने हो ही जाता है। इसके लिए उसे न्यूनतम दस हजार रुपये वेतन पर चालक रखना पड़ता है।

इसके अलावा विधायकों के विधानसभा क्षेत्र के काम करवाने के लिए शिमला सचिवालय और अन्य कार्यालयों के भी चक्कर लगते हैं। उस पर भी हर महीने कम से कम पचास हजार रुपये खर्च आ जाता है। जो शिमला के नजदीक हैं, उनका कम खर्च आता है। जो चंबा, सिरमौर, किन्नौर, कांगड़ा व लाहुल-स्पीति से आते हैं, उनका खर्च 80 हजार रुपये तक मासिक आता है। कार्यालय संचालन और उसमें सुविधाओं पर भी हर महीने बीस हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं। महंगाई के इस दौर में खुद व परिवार के रहन-सहन, पालन-पोषण के लिए लगभग पचास हजार रुपये की जरूरत पड़ती है।

यह जानना जरूरी है कि विधायक को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। जितना आसान लगता है, उतना विधायकों का जीवन होता नहीं। विधायक चुने जाने के बाद उनका निजी जीवन नहीं रहता, सार्वजनिक हो जाता है। इसलिए प्रदेश के सभी विधायक आगे आकर अपनी संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा विधानसभा की वेबसाइट और जनता के समक्ष सार्वजनिक करें। साथ ही आय के स्रोत भी बताएं। इससे उनके जीवन में पारदर्शिता आएगी, जनता भी विधायक के बारे में जान सकेगी। विधायिका के गिरते स्तर को ऊपर उठाने के लिए यह बेहद जरूरी है। (नादौन के विधायक लेखक कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हैं)

Posted By: Rajesh Sharma

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