धर्मशाला, मनोज शर्मा। आसमान की तरह नीले पानी के आसपास पक्षियों की अठखेलियां हर किसी का मन मोह लेती हैं। यह खूबसूरत नजारा आपको पौंग बांध के आसपास ही नजर आएगा। यह खूबसूरती और बढ़ जाती है जब पक्षियों का मेला लगा हो। देवभूमि हिमाचल में पौंग बांध के तट पर पहली बार बर्ड फेस्टिवल का आयोजन किया गया। कांगड़ा जिले में स्थित पौंग डैम में परिंदों की ऊंची परवाज को देखने के लिए लोगों की भीड़ भी उमड़ी। पहली फरवरी से दो दिन तक चले बर्ड फेस्टिवल में विदेशी परिंदों की अठखेलियों को पर्यटकों ने भी कैमरे में कैद किया। एवरेस्ट से भी ऊंची उड़ान भरने वाले हेडेड गूज प्रजाति के परिंदे की खूबसूरती देखते ही बनती है। चीन, तिब्बत, मंगोलिया, इराक और पाकिस्तान व अन्य देशों से आए इन परिंदों को देश की सीमाओं का बंधन भी नहीं रोक पाया।

कई देशों की सहरदों को लांघकर आने वाले इन परिंदों को देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ता है। दरअसल, सर्दी के मौसम में हर साल यहां विदेशी परिंदों की चहलकदमी बढ़ जाती है। रंगविरंगे खूबसूरत विदेशी मेहमान यहां बसेरे की तलाश में हर साल आते हैं। झील के आसपास के इलाके इन दिनों इनके कलरव से गूंजते हैं, वहीं झील में नौका के जरिये लोग इनकी अठखेलियों को निहारते हैं। पौंग बांध के कुछ रोचक तथ्यों से रू-ब-रू करवा रहा है दैनिक जागरण। रोमांच के इस सफर के लिए पहाड़ी प्रदेश में अगर समुद्र का एहसास करना हो तो चले आइए पौंग बांध..

रैंसर टापू आकर्षण का केंद्र

पौंग बांध के बीचों बीच बना रैंसर टापू विदेशों में समुद्र के बीच किसी द्वीप की याद दिलाता है। नगरोटा सूरियां में बांध क्षेत्र से इसकी दूरी करीब 10 किलोमीटर है। यहां से आप मोटरबोट के सहारे रैंसर टापू तक पहुंच सकते हैं। छोटी मोटरबोट में छह आदमी एक साथ बैठ सकते हैं। करीब तीन हजार रुपये तक एक मोटरबोट का किराया वसूला जाता है। हालांकि एक छोर से यह टापू आपको दिखाई नहीं देगा, लेकिन जैसे-जैसे पानी गहराई बढऩे के साथ ही आप आगे बढ़ते जाएंगे तो छोटा सा टापू नजर आएगा। ज्यों ही आप नजदीक पहुंचेंगे तो इसका असली आकार दिखेगा।

चारों तरफ पानी से घिरे से टापू पर आपको घना जंगल दिखेगा। इस जंगल में कई तरह के पक्षी ने अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। यहां सांपों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन इन दिनों यह अदृश्य हैं। बरसात और गर्मियों के दिनों में ही अक्सर यह दिखते हैं। पक्षियों की चहचहाट के बीच आप यहां प्रकृति के खूबसूरत नजारों का दीदार कर सकते हैं। रात को सूर्य की रोशनी से चमकने वाला यहां वन विभाग का रेस्ट हाउस दिन में भी खूबसूरत नजर आता है। यहां पर बने ऊंचे टॉपर पर चढ़कर आप दूरबीन के साथ बांध क्षेत्र के आसपास के नजारों को देख सकते हैं।

रोमांच का सफर

गहरे नीले पानी के बीच रोमांच के इस सफर के दौरान आपको पानी के सिवा कुछ नजर नहीं आएगा। पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह के समुद्र को देखकर आप रोमांचित हो उठेंगे। मोटरबोट की सवारी करते हुए सेफ्टी जैकेट के साथ सतर्कता की भी जरूरत है, चूंकि पानी की लहरों के बीच जब बोट थोड़ा उछलती है तो सतर्क रहना जरूरी है। अगर आप साहसिक गतिविधियों का शौक रखते हैं तो यह आपको रोमांचित कर देने वाले पल होंगे। मोटरबोट के चालक सोनू ने पूछने पर बताया कि किस बात का डर-अब तो यह हमारी दिनचर्या बन चुका है। चारों तरफ पानी ही पानी दिखने के बावजूद रैंसर टापू तक पहुंचना हमें असंभव सा लग रहा था, लेकिन सोनू ने आसानी से पहुंचा दिया।

विदेशी पक्षियों का बसेरा

पावर प्रोजेक्ट व कुछ प्रदेशों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए 1975 में ब्यास नदी पर तैयार किया गया पौंग बांध आज विदेशी पक्षियों की पसंदीदा सैरगाह बन गई है। कई हजार किलोमीटर का सफर तय कर हर साल यहां लाखों विदेशी पक्षी पहुंचते हैं और यहां नवंबर से अप्रैल तक प्रवास करते हैं और फिर अपने मूल स्थानों को लौट जाते हैं। पौंग बांध के निर्माण के बाद 207 वर्ग किलोमीटर में एक बड़ी झील बनी थी। जिला कांगड़ा के देहरा से लेकर पौंग बांध तक फैली यह झील करीब 37 किलोमीटर लंबी है। अंतरराष्ट्रीय रामसर वेटलैंड पौंग बांध पहुंचने वाले विदेशी पङ्क्षरदों में हेडेड गूज की उड़ान सबसे ऊंची होती है। हिमालय की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8, 848 मीटर है जबकि बार हेडेड गूज की उड़ान इस चोटी से भी कहीं ज्यादा होती है।

बार हेडड गूज

बार हेडेड गूज ऐसी प्रजाति का परिंदा है, जो माउंट एवरेस्ट यानी 30 हजार फीट से ज्यादा ऊंची उड़ान भरता है। इतनी अधिक ऊंचाई में तापमान बहुत कम होता है, लेकिन केवल यही एक ऐसी प्रजाति का पक्षी है, जो इतनी अधिक ऊंचाई के दौरान भी ठंड सहन कर सकता है या यूं कहें कि अधिक ऊंचाई पर जहां ऑक्सीजन की इन्हें दिक्कत नहीं होती है। इनमें अन्य के मुकाबले विशेष तरह की रक्त कोशिकाएं होती हैं जो सबसे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी एकाएक ऑक्सीजन को संग्रहित कर लेती हैं। इस बार पौंग झील के किनारे 49496 बार हेडड गूज पाए गए जबकि पिछली बार इनकी संख्या 29443 थी।

नॉर्दर्न पिनटेल

यह पक्षी 48 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरता है। इसकी विशेषता है कि यह 1800 मील तक लंबी उड़ान बिना विश्राम किए भर सकता है। यह पानी में तैरता भी है। सर्दियों में यह पङ्क्षरदे साइबेरिया, मध्य एशिया और उत्तर दक्षिणी एशिया से आते हैं।

पौंग झील में हर साल आते हैं लाखों पक्षी

1980 के बाद से पौंग झील में विदेशी पक्षियों के आने का सिलसिला शुरू हुआ था। पहले काफी कम तादाद में पक्षी यहां आते थे। इसे बेहद सामान्य लिया जाता था, लेकिन 1990 के बाद से यहां विदेशी पक्षियों की संख्या में एकाएक बढ़ोतरी हुई। पहले कुछ प्रजातियां यहां पहुंचती थी। इस साल 114 प्रजातियों के पक्षी पहुंचे जबकि पिछले साल यानी 2019 में 103 प्रजातियों के ही पक्षी पहुंचे थे।

कैसे होती है गणना

हिमाचल के वन्य प्राणी विभाग के अनुसार इस बार वार्षिक गणना 30 व 31 जनवरी को की गई। इस कार्य में विभिन्न विभागों के कर्मचारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं के 150 पक्षी विशेषज्ञों व वन्य प्राणी ङ्क्षवग के अधिकारियों की 26 टीमों ने योगदान दिया। इन पक्षियों की गणना के लिए कई जगह सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। इन कैमरों की निगरानी के जरिये ही पक्षियों की संख्या और प्रजाति के बारे में स्टीक जानकारी हासिल की जाती है। इस बार 114 प्रजातियों के 115701 विदेशी पक्षी पहुंचे हैं, जबकि पिछले वर्ष 103 प्रजातियों के 115229 प्रवासी पक्षियों ने दस्तक दी थी। पौंग झील में इस बार पहली बार लेसर व्हाइट फ्रंटेड गीज व ग्रेटर व्हाइट फ्रंट गीज नामक दुर्लभ प्रजाति के साइबेरियन पक्षियों ने दस्तक दी है। विशेषज्ञों के अनुसार ये दोनों प्रजातियां लुप्त हो रही हैं।

इन प्रजातियों के पक्षी पहुंचे

बार हेडड गूज, नॉर्दर्न नॉर्दर्न पिनटेल,  एयूरशियन कूट, कॉमन टिल्स, कॉमन पौचार्ड, नॉर्दर्न शोवलर, ग्रेट करमोनेन्ट, एयूरशियन विजियन, रूडी शेल्डक, कॉमन शेल्डक समेत कई अन्य प्रजातियों के पक्षी इस बार यहां देखे गए।

पत्थर नहीं ये पक्षी हैं

नगरोटा सू्रियां शहर से महज से डेढ़ किलोमीटर दूर पौंग बांध क्षेत्र का मुख्य गेट है। यहां से बांध क्षेत्र की दूरी करीब पांच सौ मीटर है। यहां पर आपको बांध के किनारे दूर से सफेद रंग के पत्थर दिखाई देंगे लेकिन ज्यों-ज्यों आप पास जाते जाएंगे तो ये पत्थर पक्षियों के झुंड नजर आएंगे। इनके करीब जाने का प्रयास करेंगे तो एकदम से पक्षियों का झुंड उड़कर दूसरी जगह ठिकाना बना लेगा। खास बात यह है कि ये पक्षी अक्सर झुंड में ही रहते हैं।

Posted By: Rajesh Sharma

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