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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 24, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जज्बे को सलाम: अपनी छाती पर तमगे सजा कर भेजा शहीद पुत्र को

By BabitaEdited By:
Published: Sat, 24 Mar 2018 09:23 AM (IST)Updated: Sat, 24 Mar 2018 12:48 PM (IST)

यही जज्बा है जिसने देश को पहला परमवीर चक्र विजेता, जिसने कैप्टन विक्रम बतरा, कैप्टन सौरभ कालिया और मेजर सुधीर वालिया जैसे शहीद दिए।

जज्बे को सलाम: अपनी छाती पर तमगे सजा कर भेजा शहीद पुत्र को
जज्बे को सलाम: अपनी छाती पर तमगे सजा कर भेजा शहीद पुत्र को

नवनीत शर्मा, शिमला। सारा देश शुक्रवार को शहीदी दिवस मना रहा था, देश के प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा के पड़ोस में एक पूर्व सैनिक पिता अपने पुत्र की शहादत को जी रहा था। कुपवाड़ा में शहीद हुए कांगड़ा के जोरावर सिंह की देह वीरवार शाम को ही अपने उस नए घर में पहुंची थी जिसकी प्रतिष्ठा अभी होने को थी। सैकड़ों नम आंखों के बीच अपने वीर पुत्र के सम्मान में कमी न रह जाए....कहीं कोई भावात्मक कमजोरी सामने न दिखे...पिता राज सिंह ने अपने सेवाकाल में मिले सभी तमगे छाती पर सजाए और पुत्र को सेल्यूट किया। उसके बाद कांधा देकर श्मशान तक पहुंचे। यही जज्बा है जिसने देश को पहला परमवीर चक्र विजेता, जिसने कैप्टन विक्रम बतरा, कैप्टन सौरभ कालिया और मेजर सुधीर वालिया जैसे शहीद दिए।

मंजर और भी थे...। छह साल के बेटे रुद्रांश द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देना...रोते हुए ही सही...बेटियों का सेल्यूट में हाथ उठाना....और पत्नी सरंजना का बेहोश होने से पहले सूने चेहरे के साथ पति को अलविदा कहना...। यह सब राज सिंह के जज्बे और हौसले के आगे कुछ नहीं। राज सिंह कल से एक ही बात कह रहे हैं, 'बेटा उस काम को बहुत अच्छे से कर के लौटा जो उसे मैंने सिखाया था...मैंने कहा था, पीठ पर गोली मत खाना...नौबत आ ही जाए तो छाती पर गोली खाना। मुझे गर्व है, बेटे ने वही किया।' बंदूकों की सलामी के बीच सफेद धोती पहन कर जब शहीद के पुत्र रुद्रांश ने पिता को मुक्त किया तो हर आंख नम थी...पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे कभी धुएं के साथ उठ रहे थे कभी लपटों में दिख रहे थे...लेकिन राज सिंह दमदार कोट पर तमगे सजा कर बाहर से संयत दिखने की कोशिश कर रहे थे। उनके पहनावे और शब्दों से दो ही शब्द साकार हो रहे थे, 'देश पहले!'

दरअसल राज सिंह का दिल फौलादी है। कुछ साल पहले सड़क हादसे में मारे गए बड़े बेटे को ऐसे ही भेजा था। उसकी पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे का हौसला बने ही हुए थे कि अब छोटा बेटा देश के काम आ गया। अब जोरावर सिंह की पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे की ताकत भी उन्हें ही बनना है, इसलिए और हौसले की जरूरत है। दोनों बेटों के लिए जमीन के टुकड़े रखे हुए थे... कई सपने देखे थे लेकिन योजनाएं भी देश के काम आ गईं। 

राज सिंह मिसाल हैं बहादुरी की, उम्मीद हैं आने वाले कल की और ताकत हैं पीछे छूट गए लोगों की। राज सिंह को गौर से देखें तो चेहरे पर साफ लिखा है, 'जोरावर सिंहों का रास्ता कोई नहीं रोक सकता... जोरावर सिंह आते रहेंगे....जब तक ऐसे राज सिंहों के पास फौलाद है।' 

पंचतत्व में विलीन हुए शहीद जोरावर सिंह

जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों से लोहा लेते वीरगति को प्राप्त हुए शाहपुर के सपूत  जोरावर सिंह (44) की पार्थिव देह शुक्रवार को पंचतत्व में विलीन हो गई। सुबह 11 बजे शहीद की पार्थिव देह का चंबी (रैत) स्थित श्मशानघाट में सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। शहरी विकास मंत्री सरवीण चौधरी ने भी श्रद्धांजलि देकर शहीद देकर परिवार को ढ़ाढस बंधाया।

श्मशानघाट पर पिता रिटायर सूबेदार राज सिंह, पत्नी सरंजना, माता शकुंतला और दोनों बेटियों हृतिका व कृतिका ने शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। जोरावर के छह साल के बेटे रुद्रांश ने चिता को मुखाग्नि दी। हवलदार जोरावर सिंह बुधवार को आतंकी मुठभेड़ में गोली लगने से शहीद हो गए थे।