भरमौर, जेएनएन। मणिमहेश यात्रा 2019 के अंतिम राधाष्टमी स्नान के लिए यात्रियों ने सोमवार को शिव चेलों से अनुमति लेना शुरू कर दिया है। चौरासी मंदिर परिसर स्थित शिव मंदिर चबूतरे में विराजमान शिव चेलों ने यात्रियों को उनकी सुखमयी व फलदायी यात्रा का आशीर्वाद देकर मणिमहेश रवाना किया। परम शिवभक्त त्रिलोचन के वंशज सचूईं गांव के शिव चेलों ने सोमवार सुबह गांव में स्थित त्रिलोचन के मंदिर में पूजा अर्चना कर चौरासी मंदिर की ओर रुख किया। जहां जम्मू कश्मीर के भद्रवाह क्षेत्र के शिवभक्त बड़ी बेसब्री से उनसे यात्रा की अनुमति मिलने का इंतजार कर रहे थे। अनुमति मिलने के साथ ही इन श्रद्धालुओं ने अपना पारंपरिक भद्रवाही नृत्य कर मणिमहेश की ओर रुख किया।

ज्ञात हो कि पूर्व में भद्रवाही श्रद्धालु शिव चेलों के शिव मंदिर में बैठने वाले दिन ही यात्रा की अनुमति प्राप्त कर मणिमहेश की ओर प्रस्थान करते थे। अब श्रद्धालुओं की संख्या बढऩे के साथ साथ देव छडिय़ों की संख्या भी अधिक हो गई है। इस कारण कुछ श्रद्धालु आज मणिमहेश के लिए रवाना हो गए तो शेष आगामी दिनों में अनुमति लेने के बाद रवाना होंगे। भद्रवाही यात्रियों द्वारा चौरासी परिसर में नृत्य किए जाने वाले दिन को न्हौण की जातर कहा जाता है। शिव चेले मंगलवार शाम तक यात्रियों को आशीर्वाद प्रदान करने के बाद चार सितंबर को मणिमहेश के लिए रवाना होंगे। जोकि पांच सितंबर को दोपहर बाद मणिमहेश झील में स्नान कर राधाष्टमी स्नान की विधिवत शुरुआत करेंगे। यह स्नान पांच सितंबर रात 8.42 बजे से लेकर छह सितंबर रात 8.41 बजे तक जारी रहेगा।

तिरलोचन के वंशज हैं शिव के चेले
शिव के चेले भरमौर मुख्यालय के साथ सटे गांव सचूई के रहने वाले हैं। इनके पूर्वज तिरलोचन थे, जो कि बहुत बड़े शिवभक्त थे। कहा जाता है कि भगवान शिव उनके सम्मुख आकर सीधे बातचीत करते थे। गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले तिरलोचन पेशे से दर्जी थे। एक बार भगवान शिव तिरलोचन के परिवार की भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से उनके घर पहुंचे। भगवान शिव भेड़ पालक (गद्दी) के वेश में तिरलोचन की मां के पास भेड़ों के लिए नमक मांगने पहुंचे। चूंकि, परिवार गरीबी में जी रहा था इसलिए तिरलोचन की मां ने कहा कि उनके घर में इतना नमक नहीं है, जिस पर गद्दी के वेश में शिवजी ने कहा कि लकड़ी के बड़े से कंजाल (संदू्क) में बहुत अधिक नमक है। तिरलोचन की मां ने जब उस कंजाल को खोला तो यह नमक से भरा हुआ था।

मां ने इसे भगवान शिव की कृपा मानकर उस गद्दी को काफी नमक दे दिया। लेकिन, नमक बहुत भारी था, जिसे ले जाना अकेले गद्दी के वश में नहीं था तो मां ने अपने बेटे तिरलोचन को उस भेड़ पालक के साथ भेज दिया। चलते-चलते दोनों मणिमहेश पहुंच गए। यहां तिरलोचन ने उस गडरिये से पूछा कि यहां तो आपकी भेड़-बकरियां तो नहीं हैं तो आप नमक क्यों लाए? जिस पर भगवान शिव ने उसे अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा कि अब तू घर लौट जा। लेकिन, इसके बारे में किसी को कुछ न बताना। इतना कहते ही भगवान शिव डल झील में अंतध्र्यान हो गए। यह सब देख तिरलोचन भी भगवान शिव के पीछे दौड़ता हुआ उसी डल झील में समा गया।

भक्त को अपने पीछे आते देख भगवान शिव ने उसे बचा लिया और कुछ वक्त अपने साथ रखा। कुछ माह बाद जब तिरलोचन ने घर लौटने की इच्छा जताई तो भगवान शिव ने अपनी वही शर्त दोहराते हुए कहा कि यह भेद किसी से न कहना। जब वह अपने गांव सचूई के ऊपर पहुंचा तो सोचा कि कुछ देर विश्राम करके घर जाता हूं। वह कमर में बांधी बांसुरी निकाल कर उसे बजाने लग पड़ा।  बांसुरी की धुन से ही पहचान कर तिरलोचन की मां ने कहा कि मेरा तिरलोचन लौट आया है, लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं था। उसी दिन घर पर तिरलोचन की मृत्यु की छह मासिक क्रिया की जा रही थी। तिरलोचन को जब इस बात का पता चला तो उसने स्वयं को रावी नदी में समाहित कर लिया।

लेनी पड़ती है शिव चेलों की अनुमति
भगवान शिव ने फिर भेड़पालक के रूप में तिरलोचन की मां को उसी दिन आकर कहा कि तिरलोचन को मैंने अपने पास रख लिया है। अगर और कोई मेरे पास आना चाहे तो उसे आपकी आज्ञा लेनी होगी। माना जाता है कि इस घटना के बाद से ही मणिमहेश जाने वाले श्रद्धालु तिरलोचन के वंशजों से अनुमति लेकर ही यात्रा करते हैं। श्रीराधाष्टमी में सबसे पहले यही शिव चेले स्नान करके इस पर्व की शुरुआत करते हैं। श्रीराधाष्टमी स्नान के दौरान यह चेले डल झील के सबसे गहरे भाग से इसे पार करते हैं।

Posted By: Rajesh Sharma

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