प्रार्थना स्वीकार होने पर मूर्ति पर आता है पसीना, हर मनोकामना पूर्ण करती हैं भलेई माता; चंबा में भव्य मंदिर
हिमाचल प्रदेश के चंबा में भलेई माता मंदिर एक जागृत शक्तिपीठ है, जहां मां भद्रकाली की प्रतिमा पर पसीना आने को मनोकामना पूरी होने का संकेत माना जाता है।

चंबा का भलेई माता मंदिर व प्रतिमा।
HighLights
चंबा में भलेई माता मंदिर एक जागृत शक्तिपीठ है।
मनोकामना पूरी होने पर प्रतिमा से पसीना निकलता है।
भक्तों के लिए 24 घंटे लंगर और ठहरने की सुविधा।
जागरण टीम, चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा शहर से करीब 38 किलोमीटर की दूरी पर सलूणी उपमंडल के तहत पहाड़ी की चोटी पर स्थित भलेई माता (मां भद्रकाली) का मंदिर शक्तिपीठों में से एक है। इस पावन धाम में मां हर भक्त की मनोकामना पूरी करती हैं। हर वर्ष हिमाचल, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर से लाखों श्रद्धालु मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।
मंदिर के चारों ओर हरे-भरे देवदार के वन और नीचे नीले जल की चमेरा झील प्राकृतिक सौंदर्य को अलौकिक बनाती है। मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं के ठहरने और 24 घंटे लंगर (भंडारे) की उत्तम व्यवस्था की जाती है। इस मंदिर की यह अनूठी मान्यता है कि यदि माता की प्रतिमा पर पसीना आए, तो समझो भक्त की मांगी गई मन्नत मां ने स्वीकार कर ली है।
मंदिर का इतिहास
इतिहासकारों और जनश्रुतियों के अनुसार, मां भद्रकाली की पावन पाषाण मूर्ति मूल रूप से भलेई के समीप बाणियाल/भ्राण नामक स्थान पर जमीन की खुदाई के दौरान एक किसान को बावड़ी से प्राप्त हुई थी। उस समय चंबा के तत्कालीन राजा प्रताप सिंह को माता ने स्वप्न में साक्षात दर्शन देकर आदेश दिया कि इस दिव्य प्रतिमा को राजधानी चंबा लाया जाए और वहां विधि-विधान से मंदिर बनाकर स्थापित किया जाए।
राजा ने माता के आदेश का पालन करते हुए शाही पालकी में मूर्ति को लेकर चंबा के लिए प्रस्थान किया। जब राजा और उनका काफिला भलेई नामक स्थान पर पहुंचा, तो रात्रि विश्राम के लिए पालकी वहीं रख दी गई।
अगली सुबह जब पालकी उठाने का प्रयास किया गया, तो वह अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई। उसी रात मां ने पुनः राजा को स्वप्न में दृष्टांत दिया कि उनका वास इसी सुरम्य पहाड़ी पर रहेगा, उन्हें चंबा न ले जाया जाए। इसके उपरांत राजा ने माता की इच्छानुसार 16वीं शताब्दी में भलेई में ही भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
मंदिर की विशेषता
भलेई माता मंदिर को 'जागृत शक्तिपीठ' माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मां भद्रकाली की श्यामवर्ण पाषाण प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नवरात्र और विशेष पूजा-अर्चना के समय माता की दो फीट ऊंची काले रंग की चतुर्भुजा प्रतिमा पर पसीना निकलता है। मान्यता है कि सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले भक्त की प्रार्थना जब माता स्वीकार करती हैं, तो मां के विग्रह पर पसीने की बूंदें झलक आती हैं।
भक्त इस पसीने को अमृत मानकर अपने रुमाल या वस्त्रों से स्पर्श करवाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मां के दरबार में सोने-चांदी के छत्र, घंटियां और नथ-चूड़ा अर्पित करते हैं। नवरात्र के दौरान यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें सैकड़ों किलोमीटर दूर से श्रद्धालु पैदल व वाहनों में जयकारे लगाते हुए पहुंचते हैं।
नवरात्र उत्सव के दौरान मां के दरबार में उमड़ने वाली भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुख्ता प्रबंध किए गए हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुलिस व होमगार्ड जवान तैनात रहते हैं। दर्शन के लिए महिला व पुरुषों की अलग-अलग कतारें बनाई गई हैं, जिससे बुजुर्गों व बच्चों को कोई असुविधा न हो। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए चौबीसों घंटे निशुल्क लंगर, ठहरने और पेयजल की व्यवस्था उपलब्ध है। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से मां के दरबार में हाजिरी भरता है, मां भद्रकाली उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करती हैं।
-कमल ठाकुर, अध्यक्ष भलेई माता मंदिर कमेटी।
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