यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 10, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
समय के साथ बदल गया सूही मेला
सुरेश ठाकुर, चंबा एक हजार वर्ष पहले मनाए जाने वाला सूही मेला वक्त के साथ-साथ बदल गया है। ऐतिहासिक

सुरेश ठाकुर, चंबा
एक हजार वर्ष पहले मनाए जाने वाला सूही मेला वक्त के साथ-साथ बदल गया है। ऐतिहासिक सूही मेला का वर्ष पहले हर वर्ष प्रथम चैत्र से होता था व पूरा मेला एक माह तक चलता था, मगर अब समय के साथ मेले का दायरा सिमटकर तीन दिन तक रह गया है। पहले पूरा माह चलने वाले मेले में प्रथम चैत्र से 14 अप्रैल तक 'फलातरे री घुरेई' मनाई जाती थी। इन दिनों शहनाई तथा बाईदार सपड़ी से पक्का टाला व शहनाई और ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे, यह क्रम हर दिन चलता था। इन्हीं चौदह दिनों तक छड़ोग मोहल्ला की महिलाएं चंबा शहर के शीर्ष में स्थित भगवती चामुंडा के मंदिर से फूल चुनती हुई घरेई डालती नाचती-गाती सपड़ी मोहल्ले तक आती थीं। उसके बाद 15 चैत्र से माता सूही के मंदिर में घुरईयों का आयोजन होता था। सूही का मंदिर उस जगह है, जहां रानी को बलिदान के लिए जाते समय पांव में ठोकर लगी थी तथा अंगूठे से खून बहा था। जिस पत्थर से चोट लगी थी, वह आज मां सूही के रूप में पूज्य है। 15 से 20 चैत्र तक सफाई करने वाली महिलाएं सूही मां के मंदिर की निचली सीढि़यों की सफाई करती थीं तथा घरेई डालती हुई नौण पनिहार जाती थीं। इसके बाद घुरेई डालने की बारी कन्याओं की आती थी। 21 से 25 चैत्र तक महिलाएं घुरेई गाती थीं। मेले के आखिरी दिन 26 चैत्र से 30 चैत्र तक (राजेरी सुकरात) होती थी। इस मेले में राजघराने की रानियां भाग नहीं लेतीं। राज कुमारियां मां सूही की पूजा-अर्चना करती तथा संभ्रांत महिलाएं सूह मढ़ के अंदर वाले भाग तथा गद्दनें बाहरी भाग में घुरेई डालती थीं। महीने का अंतिम दिन सुकरात के रूप में मनाया जाता था। यह मेले का मुख्य आकर्षण हुआ करता था।
उस दिन सूही माता के मंदिर से पूजा आदि के बाद मां की मूर्ति के साथ 'सुकरात कुड़ियों चिड़ियों सुकराट लच्छमी नरैणी हो। ठंडा पानी कियां करी पिणां हो तेरे नैना हेरी हेरी जीणा हो' गाते हुए राजमहल की जनानां प्रौली तक आती थीं। यहां मां की मूर्ति वापस लाकर रख दी जाती है। अब बदलते परिवेश में मान्यताएं भी बदल गई हैं। पुरानी परंपराएं टूटती जा रही हैं। जिस संस्कृति पर हमें नाज था, वो विलुप्त होती जा रही है। वर्तमान में मात्र तीन दिन तक सूही मेले का आयोजन हो रहा है, जो मेला औरतों के मेले के नाम पर मशहूर था, उसकी गरिमा व परंपरा टूट रही है। जो सीढि़यां अठारहवीं शताब्दी के अंत में चंबा से राजा जीत ¨सह की रानी शादा ने अपनी पूर्वज पूज्य देवी सूही की याद में बनवाई थीं, वे आज जर्जर अवस्था में हैं। सूही मढ़ में जहां शहर की महिलाएं बैठती थीं व धुरेई डालती थीं, अब बंद कर दिया गया है।