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विभाजन में घर छूटा, पर हुनर नहीं... गुजरांवाला से आकर जगाधरी को बनाया पीतल नगरी; हुनर की हथौड़ी से चमकी बर्तननगरी

Published: Wed, 04 Nov 2026 07:05 PM (IST)

यमुनानगर के जगाधरी की पहचान धातु के बर्तनों के पारंपरिक शिल्प से है, जहाँ हथौड़ी की थाप पर पीढ़ियों का हुनर गढ़ा जाता है।

ठक-ठक में बसता आत्मनिर्भरता का संसार, हुनर की हथौड़ी से चमकी बर्तननगरी।

ठक-ठक में बसता आत्मनिर्भरता का संसार, हुनर की हथौड़ी से चमकी बर्तननगरी।

HighLights

  1. जगाधरी की पहचान पीतल नगरी, धातु शिल्प का केंद्र।

  2. पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर, आत्मनिर्भरता का प्रतीक।

  3. स्टील-एल्युमीनियम में भी कारीगरों ने हुनर को रखा जीवित।

राहुल शर्मा, यमुनानगर। धातु की चादर पर हथौड़ी की पहली चोट पड़ती है तो एक लय शुरू होती है। ठक...ठक...ठक। हर चोट के साथ धातु आकार बदलती है और धीरे-धीरे थाली, परात, लोटा या दूसरा बर्तन बनकर तैयार हो जाता है। जगाधरी की गलियों में आवाज शहर की पहचान है।

यहां बर्तन सिर्फ बनाए नहीं जाते, बल्कि हथौड़ी की थाप पर पीढ़ियों का हुनर गढ़ा जाता है। यही हुनर जगाधरी को एशिया ही नहीं, पूरे विश्व में पीतल नगरी के नाम से पहचान दिलाने की कहानी का अहम हिस्सा है।

इस कहानी की जड़ें आजादी से पहले तक जाती हैं, तब लुहार व ठठेरे हाथों से बर्तन तैयार करते थे। छप्पर की दुकानों में इनकी बिक्री होती थी। विभाजन के दौरान पाकिस्तान के गुजरांवाला से आए परिवार अपने घर भले पीछे छोड़ आए, पर हुनर साथ लाए। उन्होंने जगाधरी में फिर से काम शुरू किया। हथौड़ी व धातु के सहारे नई जिंदगी शुरू की।

विरासत को संभाले हैं 1000 से अधिक परिवार

जगाधरी में बर्तन चमकाने के काम से लगभग एक हजार से अधिक परिवार जुड़े है। हर तीसरे घर में इस काम की हलचल दिखाई देती है। पहले पीतल के बर्तनों को चमकाया जाता था, पर स्टील व एल्युमीनियम का चलन बढ़ा तो कारीगरों ने खुद को भी बदल लिया। अब फैक्ट्री में आ गई है। इनमें बिहार, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी बंगाल के एक लाख से अधिक श्रमिक भी काम कर रहे हैं।

स्वदेशी हुनर की ताकत

जगाधरी के कारीगरों की कहानी केवल बर्तन बनाने या चमकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वदेशी हुनर, आत्मनिर्भरता और पीढ़ियों से चली आ रही उद्यमशीलता की मिसाल है। बिना बड़ी मशीनों और आधुनिक तकनीक के हथौड़ी की चोट से बर्तनों को चमक भरा स्वरूप देना इनकी कला है।

समय बदला, बाजार बदला और पीतल की जगह स्टील व एल्युमीनियम ने ली, लेकिन कारीगरों ने हुनर को खत्म नहीं होने दिया। कारीगर आज भी फैक्ट्रियों के लिए बर्तनों की सफाई और चमकाने का काम कर स्थानीय उद्योग को मजबूती दे रहे हैं। हुनर को संजोना ही स्वदेशी को ताकत देना है। हथौड़ी की हर चोट आत्मनिर्भर भारत की कहानी कहती है।

पुरखों की हथौड़ी थाम हुनर को बनाया रोजगार

इस विरासत की एक कड़ी 35 वर्षीय जोगिंद्र सिंह भी हैं। उनके परदादा, दादा व पिता बर्तन चमकाने का काम करते थे। अब वह उसी हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए यह महज काम नहीं, बल्कि परिवार से मिली पहचान है। पीढ़ियां बदल गईं, पर हुनर नहीं बदला। जोगिंद्र ने बताया कि उन्होंने पुश्तैनी काम को रोजगार बनाकर परंपरा को टूटने नहीं दिया।

द जगाधरी मेटल एसोसिएशन के महासचिव सुंदरलाल बत्रा ने बताया कि बर्तन तैयार होने के बाद उनकी सफाई व चमक जरूरी है। छोटे कारीगर यह काम संभालकर फैक्ट्री संचालकों का बोझ कम करते हैं। फैक्ट्री संचालकों को इसके लिए अलग जगह व श्रमिकों की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती।

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