मां-बेटे ने एक मैदान में साधे दो लक्ष्य, मां को मिली सरकारी नौकरी और तीरंदाज बेटे कुशल ने जीता एशियाई खेल में गोल्ड
कुशल दलाल ने जापान में एशियाई खेल 2026 में तीरंदाजी में स्वर्ण पदक जीता है, जबकि उनकी मां गीता दलाल ...और पढ़ें

मां गीता दलाल ( सौ. सुधी पाठक) मैदान के एक कोने में दरी बिछाकर पढ़ाई कर रही होती थीं, तब कुशल तीरंदाजी का अभ्यास कर रहे होते थे।
HighLights
कुशल दलाल ने एशियाई खेल 2026 में तीरंदाजी में स्वर्ण जीता।
मां गीता दलाल को 2019 में सरकारी लेखाकार की नौकरी मिली।
रोहतक के एक ही मैदान पर दोनों ने अपने लक्ष्य साधे।
जागरण संवाददाता, गोहाना (सोनीपत)। शाम के तीन बजते ही रोहतक के राजीव गांधी स्टेडियम में एक ही दृश्य रोज दिखता था। यह सिलसिला एक-दो दिन नहीं, लगभग चार साल तक चला। एक 12-13 साल का लड़का तीर-कमान लेकर निशाने साधने में जुट जाता और उसी मैदान के एक कोने में उसकी मां अपनी किताबें खोल लेती।
मां का परिणाम आया साल 2019 में जब वह हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड में लेखाकार के पद पर चुन ली गईं। वहीं, बेटे कुशल दलाल ने जापान में आयोजित एशियाई खेल 2026 में पुरुष कंपाउंड टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता है। इस तरह एक ही मैदान से दो लक्ष्य साधे गए, जो अब कई भारतीयों के लिए गौरव और प्रेरणाक्षर हैं।
बेटा निशाना साधता और मां करती रही तैयारी
बेटा अगले तीन घंटे तीर चलाता, मां उसी मैदान के कोने में बैठकर अपने भविष्य के पन्ने पलटती रहती। बेटा तीर चलाता रहा और मां अपने समय को व्यर्थ गंवाने के बजाय पढ़ती रही। एक ही मैदान में दो लक्ष्य सध रहे थे, जिसमें एक बेटे का और दूसरा उसकी मां का।
मां पहले अपना लक्ष्य हासिल कर चुकी है और बेटे ने निशाना साधकर लक्ष्य हासिल किया। हम बात कर रहे हैं गांव सिवानका के कुशल दलाल की, जिसने जापान में एशियाई खेलों में तीरंदाजी में पुरुष कंपाउंड स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता है।
यह सिर्फ कुशल की जीत नहीं, बल्कि मां गीता और पिता संदीप दलाल के आठ साल के बंटवारे और संघर्ष की भी जीत है। इस स्वर्ण की असली कहानी पोडियम पर नहीं, रोहतक के मैदान और सिवानका के खेत में लिखी गई है।

बेटे के लिए गांव छोड़ा, शहर में जाकर किया संघर्ष
यह कहानी 2017 से शुरू होती है। कुशल का जन्म 23 जनवरी 2005 को हुआ था। पिता संदीप दलाल एमए, बीएड हैं, मां गीता दलाल एमकाॅम, नेट क्वालीफाई हैं। गोहाना में परिवार का छोटूराम नाम से स्कूल है। कुशल ने पहली से पांचवीं तक इसी स्कूल में पढ़ाई की और यहां से कुश्ती शुरू की। गीता का मायका रोहतक में है।
बेटे के लिए सबकुछ छोड़ मां आ गई रोहतक
वर्ष 2002 में संदीप से शादी करने वाली गीता ने बड़ा फैसला लिया। बेटे के खेल करियर को आकार देने के लिए उन्होंने गांव छोड़ दिया और कुशल को लेकर रोहतक शिफ्ट हो गईं। वहां कुशल ने पढ़ाई और खेल की ट्रेनिंग दोनों की। यह वह मोड़ था जहां परिवार दो हिस्सों में बंट गया। मां-बेटा रोहतक में, तो पिता संदीप गांव में। संदीप ने स्कूल की प्राचार्य की कुर्सी छोड़ दी, खेती संभाल ली। उनकी रुचि वैसे भी खेती में ज्यादा थी।
नवयुग आर्चरी अकादमी में किया अभ्यास
संयुक्त परिवार में उनके छोटे भाई प्रदीप दलाल ने गोहाना में स्कूल की जिम्मेदारी संभाली ताकि भाभी और भतीजा रोहतक में निश्चिंत रह सकें। संदीप दिन में खेत देखते, शाम को फोन पर बेटे का हाल पूछते और अकसर रोहतक जाकर उसका हौसला बढ़ाते।

परिवार अलग-अलग जगह था, लेकिन मकसद एक था, कुशल को देश के लिए खेलने वाला खिलाड़ी बनाना। कुशल ने रोहतक में राजीव गांधी खेल स्टेडियम के साथ नवयुग आर्चरी अकादमी में अभ्यास करते हुए भविष्य की नींव रखी। जब भी कुशल पदक जीतते हैं तो पूर्व कृषि मंत्री जेपी दलाल उन्हें बधाई जरूर देते हैं।
मैदान के कोने में मां ने खुद भी गढ़ी कामयाबी की कहानी
गीता की कहानी सिर्फ बेटे के साथ खड़े रहने की नहीं, खुद को खड़ा करने की भी है। पहले वे गोहाना में अपने ही स्कूल में पढ़ाती थीं। पढ़ने और पढ़ाने की पहले ही आदत थी। रोहतक के मैदान पर बैठकर उसने भी पढ़ाई जारी रखी। उनकी यही मेहनत 2019 में रंग लाई, जब हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड में गोहाना में लेखाकार के पद पर उनकी सरकारी नौकरी लग गई। अब जापान में बेटे ने भी लठ गाड़ दिया।
