स्टेडियम बंद हुआ तो खेत में बनाई आर्चरी रेंज... वहीं साधा निशाना, अब कुशल ने Asian Games में जीता सोना
जापान में चल रहे एशियाई खेलों में गांव सिवानका के कुशल दलाल ने पुरुष कंपाउंड टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक ...और पढ़ें

कुशल दलाल।
HighLights
कुशल दलाल ने एशियाई खेलों में पुरुष कंपाउंड टीम स्पर्धा में स्वर्ण जीता।
कोरोना काल में स्टेडियम बंद होने पर खेत में आर्चरी रेंज बनाई।
परिवार के सहयोग और कड़ी मेहनत से हासिल की यह बड़ी उपलब्धि।
परमजीत सिंह, गोहाना। स्टेडियम बंद थे... खेल की दुनिया ठहर गई थी... लेकिन गांव सिवानका के कुशल दलाल के निशाने नहीं रुके। कोरोना काल में जब तीरंदाजी का अभ्यास करने के लिए मैदान नहीं मिला तो कुशल के माता-पिता ने बेटे के लिए अपने खेत को ही मैदान बना दिया।
खेत में तैयार की गई आर्चरी रेंज में निशाना साधते हुए कुशल ने पसीना बहाया और अपने सपने को जिंदा रखा। उसी मेहनत का नतीजा है कि आज जापान में चल रहे एशियाई खेलों में कुशल दलाल ने पुरुष कंपाउंड टीम स्पर्धा में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर देश, प्रदेश, गांव और परिवार का नाम रोशन किया है।
-1790776242554.webp)
रोमांचक फाइनल मुकाबले में कुशल दलाल, साहिल जाधव और गणेश मणि रत्नम थिरुमुरु की तिकड़ी ने चीन की टीम को करीबी अंतर से हराकर सोना अपने नाम किया। कुशल की इस उपलब्धि के बाद सिवानका में परिवार और ग्रामीणों में खुशी का माहौल है। कुशल ने सातवीं कक्षा में तीर-कमान पकड़ा था और उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मां बेटे के लिए रोहतक गईं, पिता ने संभाली खेती
कुशल की कामयाबी के पीछे उसके परिवार का संघर्ष भी उतना ही बड़ा है। बेटे के खेल करियर को संवारने के लिए मां गीता उसके साथ रोहतक चली गईं। प्रशिक्षण, पढ़ाई और प्रतियोगिताओं के बीच बेटे को संभालने की जिम्मेदारी उन्होंने निभाई। वहीं पिता संदीप दलाल गांव में खेती संभालते रहे और अकसर रोहतक जाकर बेटे का हौसला भी बढ़ाते रहे।

परिवार की जिम्मेदारियां अलग-अलग जगह बंटी रहीं, लेकिन लक्ष्य एक ही था... कुशल को देश के लिए खेलने वाला खिलाड़ी बनाना। आज एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक उसी लंबे संघर्ष का परिणाम है।
खेत में बनाए गए मैदान से शुरू हुआ अभ्यास अब एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक तक पहुंच चुका है। कुशल ने साबित किया कि सुविधाएं कम हों तो भी लगन, परिवार का साथ और लगातार मेहनत सपने को मंजिल तक पहुंचा सकती है।
-1790776292491.webp)
संघर्षपूर्ण दौर रहा कोरोना काल
कुशल के सफर का सबसे संघर्षपूर्ण दौर कोरोना काल रहा। मार्च 2020 में कुशल और उसकी मां रोहतक से गांव लौट आए। लाकडाउन के कारण स्टेडियम बंद हो गए और नियमित अभ्यास का रास्ता बंद हो गया। परिवार ने कुशल ने लिए काेरोना काल को रुकावट नहीं बनने दिया।
खेत में आर्चरी रेंज तैयार कराई और कुशल वहीं रोज निशाने साधने लगा। सीमित संसाधनों के बीच लगातार अभ्यास जारी रखा। खेत में बहाया गया यही पसीना आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी ताकत बना।
दूसरे पर हाथ नहीं उठा सकता, इसलिए बॉक्सिंग को नहीं चुना
कुशल ने खेल का सफर गांव में पांचवीं कक्षा में कुश्ती से शुरू किया था। सातवीं कक्षा में उसकी मां गीता दलाल उसे पढ़ाने के साथ खेल प्रशिक्षण दिलाने के लिए रोहतक ले गईं। मां उसे बाक्सिंग का प्रशिक्षण दिलाना चाहती थीं। वह जब उसे स्टेडियम में लेकर गई तो कुशल ने कहा कि वह किसी दूसरे पर हाथ नहीं उठा सकता।
-1790776317712.webp)
तीरंदाजी ने कुशल को ऐसा आकर्षित किया कि उसने इसी खेल को अपना लक्ष्य बना लिया। रोहतक के राजीव गांधी स्टेडियम में उसने कोच संजय सुहाग से प्रशिक्षण लिया। इसके बाद एक अकादमी भी ज्वाइन की। बेटे के भविष्य को देखते हुए मां गीता रोहतक में उसके साथ रहीं और वहां से ही ड्यूटी पर आती-जाती रहीं।
वे हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड में खरखौदा में लेखाकार हैं। पिता संदीप दलाल गांव सिवानका में खेती संभालते रहे। संयुक्त परिवार में संदीप के भाई प्रदीप दलाल भी परिवार के साथ गांव में रहते हैं और गोहाना में स्कूल चलाते हैं।
2018 में पहला नेशनल पदक, फिर लगातार बढ़ता गया कारवां
कुशल ने वर्ष 2018 में अंडर-14 नेशनल प्रतियोगिता में अपना पहला पदक जीता। आंध्रप्रदेश में हुई इस प्रतियोगिता से शुरू हुआ पदकों का सिलसिला आगे बढ़ता गया। इसके बाद उसका चयन खेलो इंडिया योजना में हुआ। वर्ष 2021 में 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह साई सेंटर से जुड़ा।
-1790776425262.webp)
इसी वर्ष विश्व तीरंदाजी युवा चैंपियनशिप में कैडेट वर्ग की पुरुष टीम और मिश्रित टीम स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतकर उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एशिया कप, विश्व खेलों, राष्ट्रीय और विश्वविद्यालय स्तर की प्रतियोगिताओं में वह कई पदक जीत चुका है। बैंकाक में हुए एशिया कप में अंडर-21 वर्ग में उसके नाम विश्व रिकार्ड भी रहा।
पोते ने देश का नाम रोशन किया
कुशल के पदक जीतने पर उसकी दादी ओमी और रिश्ते में दूसरी दादी रोशनी देवी भी बेहद खुश हैं। ओमी ने कहा कि पोते ने देश नाम रोशन किया। उसे आगे भी कड़ी मेहनत करनी है और ओलिंपिक में भी पदक जीतना है।
