रोहतक, [अरुण शर्मा]। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का रोहतक से खासा लगाव रहा। उनकी सादगी वाले किस्से आज भी यहां चर्चित हैं। वह करीब छह बार रोहतक आए। विदेश मंत्री बनने से पहले भी वहां आए औ इस दौरान वह पार्टी से जुड़े वर्करों के घर भोजन करते थे। भोजन के बाद थाली भी खुद उठाते। यदि उन्हें कोई ऐसा करने से रोकता तो कहते पार्टी ने मुझे यह संस्कार दिए हैं।

एक दफा तो कलानौर जनसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की चप्पलें ही चोरी हो गईं। बाद में तमाम लोगों ने ऑफर दिया कि रोहतक चलकर मनचाही नई चप्पलें खरीदी जाएं। अटल मुस्कुराए और रोहतक निवासी शिवादिता उर्फ चाचानाथी से कलानौर से ही हवाई चप्पल लाने को कहा। समर्थक अचरज में पड़ गए। जैसे ही हवाई चप्पलें आईं तो उन्हीं को पहनकर कलानौर से रवाना हो गए।

खुद ही थाली उठाते, कोई रोकता तो कहते यह मेरे संस्कार

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर शिवादिता उर्फ चाचानाथी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हमारी चप्पल-जूतों की पुश्तैनी दुकान है। चप्पल चोरी हो गई तो उन्होंने मुझे बताया। मैंने अपनी दुकान से सही नाप की और आकर्षक चप्पलें दिलाने का निवेदन किया। मगर उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर कलानौर से ही हवाई चप्पल ली गई। शिवादिता का कहना है कि करीब सौ बार उनकी अटलजी से मुलाकात हुई।

रोहतक की रेवड़ी के मुरीद थे अटल

रोहतक की रेवडिय़ों के मुरीद अटल भी थे। पूर्व उप मुख्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे डा. मंगलसेन के भतीजे मदनलाल कहते हैं कि अटल बिहारी को स्वादिष्ट व्यंजनों से बेहद लगाव था। मंगलसेन कई दफा रेवडिय़ां अपने साथ लेकर गए। रोहतक में आते थे तो लाला हुकुमचंद, चिमनलाल आदि के घरों में भोजन करते थे। उन्हें बड़े बाजार की पूडिय़ां भी पसंद थीं।

जब माइक से बोले अटल- आगे बढ़ूंगा तो मंच से गिर जाऊंगा

अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान हंसी-ठिठोली के लिए भी होती रही है। पूर्व जिलाध्यक्ष सुरेंद्र बंसल बताते हैं कि रोहतक में एक जनसभा का आयोजन हो रहा था। मंच पर अटल खड़े हुए थे, जबकि सामने समर्थकों की भारी भीड़ थी। भीड़ से आवाज आने लगी अटल तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं। जब अटल माइक पर आए तो आते ही कहा कि आपने मंच तो बेहद छोटा बनवाया है। यदि मंच से आगे बढ़ा तो गिर जाऊंगा...और जोर-जोर से हंसने लगे।

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...जब राखी बांधने पर अटलजी ने दिए सौ रुपये

फतेहाबाद, [मुकेश खुराना]। वाजपेयी जहां जाते एक अपनेपन का रिश्ता स्वत: ही जुड़ जाता था। फतेहाबाद में भी करीब 43 साल पहले वह एक आदर्श रिश्ता जोड़ गए। वह रिश्ता था, धर्म भाई का। अपने स्तर पर वह इस रिश्ते को बखूबी निभाते रहे। उस सुखद पल को याद करती हुई डाॅ. एन रॉय की बेटी डाॅ. रमेश चक्रवर्ती बेहद भावुक हो जाती हैं।

वह बताती हैं कि वर्ष 1975 में भारतीय जनसंघ के कट्टर समर्थक डा. एन रॉय के घर कार्यकर्ताओं की मीटिंग रखी गई थी। डाॅ. मंगल सेन सरीखे कद्दावर जनसंघ के पदाधिकारियों की मौजूदगी वाली इस बैठक की अध्यक्षता अटलजी को करनी थी। वह समय से आए। मैंने उनका स्वागत किया। इसके बाद अटलजी की कलाई पर राखी बांधी और फिर तिलक लगाया। अटलजी ने मेरे सिर पर स्नेह भरा हाथ रखते हुए सौ रुपये दिए थे। उस सौ के नोट को मैंने वर्षों तक सहेज कर रखा।

डाॅ. रमेश चक्रवर्ती कहती हैं, धर्म-भाई स्वीकारते हुए उन्होंने पत्राचार करते रहने के लिए कहा। इस पर उसने करीब 15 साल तक चिट्ठियां लिखने का सिलसिला जारी रखा। अटलजी के हर पत्र का जवाब देते थे। उनका जवाब देश के प्रति ईमानदार रहने के आदेश से ही शुरू होता था। इसके बाद ही हालचाल पूछा जाता था। डॉ. चक्रवर्ती कहती हैं कि अपने भाई के व्यक्तित्व पर ताउम्र नाज करती रहूंगी। जन-जन के प्रिय भाई अटलजी को शत-शत नमन...।

Posted By: Sunil Kumar Jha