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हरियाणा में आबादी देह के मालिकाना हक पर नया कानून, कब्जाधारी का नाम दर्ज होने के बाद ही मिलेगा प्रमाणपत्र

Published: Tue, 03 Nov 2026 04:09 PM (IST)

हरियाणा में आबादी देह के मालिकाना हक के लिए 'हरियाणा आबादी देह अधिनियम, 2025' नामक नया कानून लागू किया गया है।

हरियाणा में आबादी देह के मालिकाना हक पर नया कानून (File Photo)

हरियाणा में आबादी देह के मालिकाना हक पर नया कानून (File Photo)


HighLights

  1. आबादी देह के मालिकाना हक पर नया कानून लागू।

  2. सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने पर ही मिलेगा प्रमाणपत्र।

  3. आपत्ति के लिए 90 दिन, अपील के लिए 30 दिन का समय।

रत्न पंवार, रोहतक। जिले के गांवों में मकान, आंगन, दुकान और आबादी देह के भूखंडों पर लंबे समय से चले आ रहे मालिकाना हक के सवालों को सुलझाने के लिए नई व्यवस्था लागू की है। हरियाणा आबादी देह यानि अधिकार निहित करने, दर्ज करने और स्वामित्व संबंधी विवाद सुलझाने अधिनियम, 2025 के तहत पात्र कब्जाधारी के अधिकारों को निर्धारित प्रक्रिया से सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा।

अंतिम रिकॉर्ड में नाम आने के बाद संबंधित व्यक्ति को स्वामित्व प्रमाणपत्र जारी करने का प्रावधान है। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि गांवों की आबादी देह में कई परिवार पीढ़ियों से मकानों पर काबिज हैं, लेकिन उनके अधिकारों के समर्थन में स्पष्ट और अद्यतन अभिलेख उपलब्ध नहीं रहे हैं।

अधिनियम को 19 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया। इसमें 26 नवंबर 2025 से लागू होने का प्रावधान है। कानून का उद्देश्य आबादी देह में पात्र व्यक्ति के अधिकारों की पहचान करना, उनका रिकार्ड तैयार करना और सीमाओं से जुड़े विवादों को सुलझाना है। इसके लिए सर्वेक्षण, नक्शे और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति की पहचान की जाती है।

इसके बाद सक्षम राजस्व अधिकारी प्रस्तावित रिकार्ड तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाते हैं। कानून के अनुसार, केवल लंबे समय से कब्जा होने का दावा करना अपने आप में हर परिस्थिति में मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं है।

यह देखना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति की स्थिति कानून में तय पात्रता के अनुरूप है या नहीं। किरायेदार, पट्टेदार, बंधकधारी और अस्थायी कब्जे वाले व्यक्ति को केवल इसी आधार पर मालिक नहीं माना जाता। अंतिम प्रविष्टि निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही की जाती है।

आपत्ति दर्ज कराने का अवसर

प्रस्तावित रिकॉर्ड और नक्शे को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की व्यवस्था है, ताकि प्रभावित लोग संपत्ति की सीमा, क्षेत्रफल या स्वामित्व संबंधी प्रविष्टि की जांच कर सकें।

अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, रिकार्ड प्रदर्शित होने के बाद सामान्यतः 90 दिन के भीतर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। पर्याप्त कारण होने पर अधिकारी समयसीमा के बाद आई आपत्ति पर भी विचार कर सकता है।

आपत्ति मिलने पर संबंधित पक्षों को सुनने और दस्तावेजों की जांच करने के बाद निर्णय दिया जाता है। कानून में इस निर्णय के लिए भी समयसीमा तय की गई है। इसका उद्देश्य यह है कि विवाद अनिश्चित अवधि तक लंबित न रहें और रिकार्ड में बदलाव का आधार स्पष्ट हो।

अपील और समीक्षा के अलग प्रावधान

अधिनियम में असंतुष्ट पक्ष के लिए अपील, समीक्षा और पुनरीक्षण के रास्ते निर्धारित हैं। धारा 14 के तहत संबंधित आदेश के विरुद्ध सामान्यतः 30 दिन के भीतर अपील की जा सकती है।

इसके बाद कानून में निर्धारित शर्तों के अनुसार अगली अपील का भी प्रावधान है। धारा 15 में आदेश की समीक्षा और धारा 16 में आयुक्त के समक्ष पुनरीक्षण की व्यवस्था दी गई है। इन प्रक्रियाओं में संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया जाना जरूरी है।

  • प्रक्रिया: सामान्य समयसीमा
  • प्रारंभिक रिकॉर्ड पर आपत्ति : 90 दिन
  • संबंधित आदेश के खिलाफ अपील : 30 दिन
  • समीक्षा के लिए निर्धारित अवधि : 60 दिन
  • पुनरीक्षण के लिए आवेदन की अवधि : 60 दिन
  • नोट : ये समय सीमाएं संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार लागू होंगी।


निजी संपत्ति और साझा जमीन में अंतर

कानून में निजी मकान या भूखंड के साथ-साथ गांव की साझा जमीन की स्थिति को भी ध्यान में रखा गया है। सड़क, रास्ते, सार्वजनिक पार्क, तालाब, खेल मैदान और समुदाय के उपयोग वाले अन्य स्थान साझा क्षेत्र की श्रेणी में आ सकते हैं।

पंचायत में निहित साझा जमीन केवल किसी व्यक्ति के कब्जे के आधार पर उसकी निजी संपत्ति नहीं बन जाती। अधिनियम में कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए अलग प्रावधान हैं, जिनकी जांच संबंधित अभिलेख और वैधानिक शर्तों के आधार पर होगी।

अब नए कानून में दर्ज प्रविष्टियों को तब तक सही मानने का प्रावधान है, जब तक उसके विपरीत प्रमाण सामने न आए या कानून के अनुसार नई प्रविष्टि न की जाए। अधिनियम के दायरे में आने वाले मामलों पर सामान्य दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र पर भी रोक का प्रावधान है। इसलिए ग्रामीण परिवारों के लिए जरूरी है कि वे अपने मकान और भूखंड का विवरण, उपलब्ध दस्तावेज, हिस्सेदारी और सीमाओं की जांच करें। रिकार्ड में गलती मिलने पर निर्धारित समय में आपत्ति दर्ज कराएं। सही प्रक्रिया से तैयार अभिलेख भविष्य में स्वामित्व और हस्तांतरण से जुड़े विवादों को कम करने में मदद कर सकते हैं। - राजपाल चहल, जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी, रोहतक।

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