माना तुम्हें गाय, गीता, गंगा और गायत्री से लगाव है, लेकिन मुझे भी इन सबसे परहेज कहां है। मैं भी सनातन संस्कृति में पला-पढ़ा हूं, लेकिन यह संस्कृति 'आरती' करना भी तो सिखाती है। जब एक साथ कदमताल करना है तो आपको मेरा एक कहना भी मानना होगा। आपको आरती करनी होगी। तुम्हें आरती मंजूर नहीं तो हमें कमल मंजूर नहीं..। आजकल बड़े साहबजादे का नाम लेकर चौपालों पर यही किस्से चल रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि रेवत नगरी से लेकर कानोड तक, द्रोणाचार्य की नगरी से लेकर बीरबल की नगरी तक यही किस्सा रह गया है। विरोधी इसलिए उछाल रहे हैं ताकि आरती का मामला बड़े साहबजादे व कमलदल के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन जाए। जिसे देखों उसके पास यही सवाल है-ये बड़े साहबजादे क्या करेंगे यार। जोगिया ने जवाब दिया-अरे ये भी पूछने की बात है? जहां होगी आरती वहीं खिलेगा कमल, क्योंकि बड़े साहबजादे इस मुद्दे को लेकर टकराव मोल नहीं लेंगे। टकराव मोल नहीं लेंगे तो मनोकामना पूरी होगी।

--------- ये दोस्ती है या दुश्मनी साहब

बात बड़े साहबजादे, मंझले साहबजादे व छोटे साहबजादे की। पहले वाले कमलदल के बल पर वजीर, मंझले पंजादल में जाने का बेताब और छोटे पंजादल में पहले ही विराजमान। सुना है तीनों के बीच संवादहीनता नहीं है, लेकिन इसकी सौ फीसद सटीक जानकारी किसी के पास नहीं। जो तीनों के बीच गहरी दुश्मनी मानते हैं, उनका कहना है कि यदि बड़े वाले को छोटे से प्यार होता तो कौशल नगरी के चुनावों में भाई को छोड़कर भाग्यशाली नेता के साथ क्यों जुटते? प्रत्यक्ष में तो इस तर्क की सीमा खत्म हो जानी चाहिए, लेकिन जानकारों की माने तो असलियत में असली तर्क ही यहां से शुरू होते हैं। कहते हैं कि अगर बड़े साहबजादे भाग्यशाली की मदद नहीं करते तो फिर कौशल नगर में हालूहेड़ा नरेश की जय जयकार हो रही होती। ये राव परिवार का चक्रव्यूह है जनाब, राव परिवार का। इसे तोड़ना आसान नहीं है। फिलहाल डंके की चोट पर यह कहना जल्दबाजी है कि तीनों के बीच दिखावटी दुश्मनी और असली दोस्ती है या वाकई दुश्मनी, परंतु जोगिया के एक खबरची का दावा है कि तीनों के पास जाएं तो एक दूसरे की बुराई न करने में ही फायदा है।

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राव का विकल्प नया राव

अगर आपकी याददाश्त कमजोर नहीं है तो आपको यह बात याद होगी कि कुछ दिन पहले दु:ख निवारण कमेटी की कमान किसके पास थी? चलो हम बता देते हैं। नरश्रेष्ठ नेताजी इसकी कमान संभाल रहे थे। हालात व दबाव के चलते मुखिया जी ने नरश्रेष्ठ की इस कमेटी से बिदाई कर दी, लेकिन दु:ख हरने वाले को मुखिया जी दु:ख देना नहीं चाहते थे। जब भी मौका लगता है तो नरश्रेष्ठ की इच्छा का सम्मान किया जाता है। कसरत दिवस पर जलवा देख ही लिया न। मुखिया जी नरश्रेष्ठ की इच्छा पूरी कर ही देते हैं। सुना है इसके पीछे राज छुपा हुआ है। यह राज है राव का विकल्प नया राव। अगर एक राव रूठे तो कमलदल के पास दूसरे राव तैयार रहेंगे। यही वजह है कि बादशाह नगरी के नरश्रेष्ठ को रेवत नगरी में बेखौफ भ्रमण की छूट मिली हुई है।

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बहुत मजबूत है सुधारक

सुधारक को लेकर एक किस्सा तेजी से चल रहा है। किसी ने सुधारक के एक समर्थक से कहा कि तुम्हारे नेताजी तो बड़े कमजोर हैं जनाब, लेकिन जो जवाब मिला उसने सवाल करने वाले की बोलती बंद कर दी। पहला सवाल-क्या अपनी ही सरकार से अधिकार मांगने के लिए 15 विधायकों का नेतृत्व करने के लिए आगे आना कमजोर की पहचान है? क्या आरक्षण आंदोलन के समय जब हरियाणा जल रहा था, तब बेबाक बोलना कमजोर की पहचान थी? क्या विधानसभा में डंके की चोट पर अपनी ही सरकार के उस निर्णय का विरोध करना कमजोरी थी, जिसमें सरकार एक जाति के दबाव में आकर झुक रही थी..। जब सुधारक के समर्थक ने धारा प्रवाह अंदाज में अपने नेता की मजबूती के एक के बाद एक कई किस्से बताए तो सुधारक को कमजोर कहने वाले को बीच में कहना पड़ा-बहुत मजबूत हैं भाई, सुधारक।

------ हम भी टिकट की दौड़ में हैं भाई

रेवत नगरी में इन दिनों टिकटार्थियों ने पसीना बहाने में कोई कमी नहीं छोड़ी हुई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि कमलदल में सुधारक जी को वयोवृद्ध मानकर किसी अन्य को आशीर्वाद देने के लिए कहा जाएगा, लेकिन सुधारक जी तो खुद को पूरी तरह तरोताजा दिखा रहे हैं। गुलाबी रंगत देखकर वयोवृद्ध तो दूर वृद्ध कहने की हिम्मत भी नहीं पड़ सकती, लेकिन राजनीति में एक की विदाई और दूसरे का आगमन होना शाश्वत नियम है। इसी नियम ने कइयों की उम्मीद जगाई हुई है। सुधारक का परिवार भी हालात भांपकर युवा चेहरों को आगे कर चुका है। सेक्टर तीन वाले डॉक्टर साहब बावल रोड पर कमलम नाम का नया ठिकाना बनाकर 45 डिग्री में सुनहरे भविष्य की उम्मीद तलाश रहे हैं। मामला यहां तक ही नहीं है। गढ़ी बोलनी रोड वाले पंडितजी भी आजकर कुर्ते को कुछ ज्यादा ही कलफ दे रहे हैं। कमलदल में कभी आरती, कभी वीरांगला व कभी नरश्रेष्ठ की चर्चा भी चलती है, लेकिन इन चर्चाओं को अभी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। पंजादल में फौजी एवं फौजी के बेटे के सामने वेकेंसी नहीं दिख रही है, जबकि पिछली बार ऐनक से दुनिया देखने वाले प्रधानजी को अभी चश्मे की जरूरत नहीं हुई है।

Posted By: Jagran

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