मजबूरी है हेलमेट, क्योंकि कर्ज अभी बाकी

शहर के बावल रोड व जिला सचिवालय के आसपास एक रिक्शा चालक हेलमेट लगाए घूमता हुआ दिखाई देता है। कुछ लोग उसे बेवकूफ बोल देते हैं तो कुछ रिक्शा पर भी हेलमेट लगा कर चलना दोपहिया वाहन चालकों को नसीहत देने का मैसेज मान लेते है। यह रिक्शा चालक है झारखंड के बैजनाथ निवासी कमरुद्दीन। रिक्शा पर हेलमेट लगा कर चलते देखकर लोगों के मन में सवाल भी उठते है। हमने भी कमरुद्दीन को रोक कर यही सवाल दाग दिया। दरअसल, नोटबंदी के दिन रिक्शा चलाते समय नशे में धुत्त मोटरसाइकिल पर सवार तीन युवकों ने उन्हें टक्कर मार दी थी। उनका पीजीआइ चंडीगढ़ में उपचार चला और जिदा बच गए। उपचार में सिर पर कर्जा चढ़ गया। अभी भी ढाई लाख का कर्ज बकाया है। कमरुद्दीन ने बताया कि अभी ढाई लाख का कर्ज बाकी है। मदद करने वाले का कर्ज चुकाना है, इसलिए जिदा भी रहना है।

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भेड़ की खाल में और कितने भेड़िये जहां धर्म की बात हो, वहां लोगों को सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं। जहां मनुष्य की श्रद्धा होती है, वहां उसे अपवित्रता नजर नही आती परंतु समाज में ऐसे लोगों की कमी भी नहीं है, जो मंदिर जैसी पवित्र जगह पर रह कर घिनौने कार्य करने से नहीं डरते। समाज में दर्जनों ऐसे उदाहरण प्रत्यक्ष रूप से सामने आ चुके है। हाल ही में जिले में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां पूजा करने पहुंची महिला को ही हवस का शिकार बनाने का प्रयास किया गया। परतें खुली तो कई छुपे कारनामे भी सामने आए। अभी भी कुछ भक्तों की आंखों से चश्मा नहीं उतर रहा है। पुलिस आन रिकार्ड अपराधियों की कुंडली तो खंगाल लेती है, परंतु धर्म की आड़ में छुपे हुए, छुपे ही रह जाते है। जरा अब इनकी कुंडली भी खंगाल लो। पता नहीं भेड़ की खाल में कितने और भेड़िये निकल आए।

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बड़े मौज में, छोटे खौफ में समाज में व्यक्ति के स्टेटस के अनुसार न केवल नियम बदल जाते है, बल्कि कानून भी लचर हो जाता है। समाज में यदि स्टेटस ऊंचा है तो सख्त से सख्त नियम और कानून बौने हो जाते है। बैंक द्वारा दिए जाने वाले कर्ज की वसूली में भी स्टेटस के हिसाब से ही नियमों पर अमल होता है तथा कानून में छेद भी हो जाते है। कुछ बड़े व्यापारी और उद्योगपति बैंक से लिए गए कर्ज पर कुंडली मार लेते है, जबकि मामूली कर्ज उठाने वालों के घुटने टिक जाते है। कुछ मामलों में तो प्रताड़ना से परेशान होकर मौत को गले लगाना पड़ जाता है। गांव राजगढ़ निवासी अमर सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक लाख 44 हजार रुपये के कर्ज ने अमर सिंह की जान ले ली। बैंकों के आशीर्वाद से बड़े कर्जवान मौज में है, लेकिन जाल में फंसने वाले छोटे कर्जवान खौफ में।

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गले की फांस बन गई दबंगई पुलिस का दबंग होना अच्छी बात है मगर इस दबंगई का खौफ बदमाशों में होना चाहिए न कि आम जनता पर। आम जनता तो वैसे ही बेचारी खाकी के पास आने से हिचकती है। दबंगई बदमाशों के प्रति हो तो समाज में भी तारीफ मिलती है और यदि आम जनता हो तो यह गले की फांस भी बन सकती है। ऐसा ही कुछ गांव भाड़ावास चौकी इंचार्ज के साथ हुआ। कुछ दिन पूर्व एक युवक मोटरसाइकिल का चालान काट कर इंपाउंड करने की घटना के बाद शिकायत पुलिस कप्तान तक भी पहुंची थी। उस समय क्या हुआ था, यह तो पुलिस की जांच के बाद स्पष्ट होगा। अभी पहली शिकायत से पीछा छूटा भी नहीं था कि एक बार फिर चौकी इंचार्ज पर दबंगई का न केवल आरोप लगा, बल्कि अपने ही थाने में पर्चा दर्ज हो गया। अब सच्चाई कुछ भी हो, परंतु चर्चा यही है कि दबंगई फांस बन गई।

Posted By: Jagran

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