यमुनानगर, जागरण संवाददाता। साढौरा निवासी शिक्षाविद व समाज सेवी गोबिंद सिंह भाटिया जल संरक्षण, पौधारोपण, पर्यावरण बचाने के लिए लगे हुए हैं। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लेख लिखकर व गोष्ठियां कर लोगों को जागरूक भी करते हैं। गोबिंद सिंह भाटिया राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय माडल कालोनी में बतौर अंग्रेजी प्राध्यापक कार्यरत हैं।

छुट्टी के दिन या स्कूल समय के बाद भाटिया जो यहां पर भी टैंट नजर आता है। वहां पर पहुंचकर पंडाल या डस्टबिन से पड़ी प्लास्टिक की खाली बोतलों को एक थैले में एकत्र करते हैं। उनमें जो पानी बचा होता है। उन्हें आसपास गमलों में या पेड़- पौधों में डालते हैं। लोग अक्सर इस काम को करने में शर्म महसूस करते हैं। भाटिया को यह काम कर गर्व होता है। बता दे कि गोबिंद सिंह भाटिया को हरियाणा पंजाबी साहित्य अकादमी, प्रशासन व सामाजिक संस्थाएं कई दफा सम्मानित कर चुकी हैं।

बोतले बेचकर पैसा लगाते हैं सामाजिक कार्यों में

प्लास्टिक की खाली बोतलों को कबाड़ी के पास बेच कर जो पैसा मिलता है। उसे सामाजिक कार्यों में लगा देते हैं। गोबिंद सिंह का कहना है कि वह एक तो प्लास्टिक की बोतलों को इकट्ठा करके कचरा प्रबंधन मतलब पर्यावरण को दूषित होने से बचाते हैं। दूसरा पानी की हो रही बर्बादी को भी कम करते हैं। बाइक की डिग्गी में एक बैग अक्सर रखते हैं। जिसमें पाइप रैंच, कुछ टूटियां, प्लग, निप्पल, धागा, सफेदा आदि होता है। जहां भी उनको बिना टूटी के पानी व्यर्थ बहता दिखता है।

वहीं बैग खोलकर टूटी फिट कर देते हैं। यदि कहीं आते- जाते रास्ते में उन्हें सार्वजनिक नल से पानी व्यर्थ बहते दिखता है तो उसको बंद करते हैं। लोगों को जल बचाने का संदेश देते हैं। यदि उन्हें किसी के घर से व्यर्थ पानी बहने या टंकी ओवरफ्लो होकर पानी बहते दिखाई देता है तो उनके घर जाकर टूंटी या मोटर बंद करने के लिए कहते हैं।

गोबिंद बताते हैं कि ऐसा करते हुए उन्हें लोगों से बहुत कुछ सुनने को भी मिलता है। जलसंरक्षण की मुहिम चला रहे गोबिंद सिंह लोगों को पानी बचाने व पौधे लगाने हेतु संदेश के लिए छोटे-छोटे प्रेरणादायक लेख लिखकर ट्रैक्ट छपवाकर मुफ्त में बांटते हैं। इसके अतिरिक्त गुरुद्वारा साहिब, स्कूल या अन्य स्थानों पर मंच संचालन करते समय जल बचाने पौधारोपण व पर्यावरण बचाने बारे अक्सर संदेश देते रहते हैं। यह मुहिम कई वर्षों से जारी है, वह अपने घर आम,जामुन, आड़ू, चीकू आदि फलों की गुठलियों को भी डस्टबिन में नहीं फेंकने देते उन्हें सुखाकर अपने डिग्गी में रख लेते हैं और बाहर कहीं आते- जाते सड़क के किनारे या खाली जगह पर फेंक देते हैं। वह कहते हैं कि ऐसा करने से यदि एक सीज़न में कम से कम एक पेड़ भी लग गया तो हमारा प्रयास सफल है।

उनका बेटा अमनजोत सिंह (बाल साहित्यकार) भी उनकी इस मुहिम में पूरा साथ देता है। भाटिया का कहना है कि 15- 20 वर्ष पहले हम लोगों को बताते थे कि मोबाइल से फोटो देखकर एक दूसरे से बातचीत हो सकेगी लोग मानने को तैयार नहीं थे अब बता रहे हैं कि 10- 15 वर्षों बाद जल की बहुत कमी हो जाएगी, पीने के लिए भी पानी नहीं मिलेगा। यह बहुत चिंता का विषय है अभी भी लोग मानने को तैयार नहीं। अभी हम इस मुफ्त मिलने वाली कुदरती देन के प्रति गंभीर नहीं हैं। क्या कभी किसी ने सोचा था कि पानी भी बंद बोतलों में बिकेगा? पानी को देवता मानकर भारतीय संस्कृति में पूजा की जाती है, उस देवता का निरादर होते हुए हम दिन में कई बार देखते हैं।

Edited By: Anurag Shukla