जींद, जागरण संवाददाता। लड़कियों को आर्थिक तौर पर मजबूत करने व उनकी पहचान बनवाने के लिए छह साल पहले घरों पर बेटियों के नाम नेमप्लेट मुहिम शुरू हुई थी। इस मुहिम के तहत प्रदेशभर में अब तक 16 हजार घरों पर बेटियों के नाम की प्लेट लगाई जा चुकी हैं। अब इस अभियान पर डाक्यूमेंटरी फिल्म शुरू हुई है, जिसमें पितृसत्ता पर प्रहार किया जाएगा।

इस अभियान के जनक जिले के गांव बीबीपुर के पूर्व सरपंच सुनील जागलान ने बताया कि वर्ष 2015 में बेटी नंदिनी की नेमप्लेट लगाकर पितृसत्ता पर प्रहार करने की शुरुआत की थी। तब से अब तक की यात्रा को अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म न्यूजरील एशिया द्वारा डाक्यूमेंटरी बनाई जा रही है। इस अभियान के बाद लोगों में अब कुछ बदलाव देखने को मिल रहा है।

सुनील बताते हैं कि शुरुआत में गांव में 30 नेमप्लेट लगाई गई तो कुछ लोगों ने ये नेमप्लेट लगाने से मना यह कहते हुए भी कर दिया था कि बेटी तो पराया धन होती है। आज भी लड़कियों के संपत्ति अधिकार को घरवाले देने की इच्छा नहीं रखते और लड़की पर भी सामाजिक दबाव रहता है कि उसने उसका हक लिया तो उसके घर वाले ससुराल में आना-जाना बंद कर देंगे। घरवाले इस अभियान को संपत्ति अधिकार से जोड़कर ही देखते हैं। डाक्यूमेंटरी की डायरेक्टर सुरभि ने बताया कि यह बहुत महत्वपूर्ण अभियान है जो लड़कियों को आर्थिक तौर पर व पहचान बनवाने में बहुत कारगर साबित होगा। फिल्म में शूटिंग बीबीपुर गांव से शुरू हुई और अभी हिसार जिले के दस गांवों में लग रही नेमप्लेट को भी इसमें शूट किया गया।

नेमप्लेट की खुशी बयां नहीं कर सकते

डाक्यूमेंटरी बनाते समय खासकर लड़कियों से बातचीत की गई तो बताया कि घर के बाहर उनके नाम की नेमप्लेट लगने से एक अजीब प्रकार की खुशी है, जिसे शब्दों में ब्यां करना आसान नहीं हैं। घर के बाहर जब नए गांवों में नेमप्लेट लगती है तो लड़कियों में उत्साह देखने को मिलता है। कई बार हंसते हुए लोग नेमप्लेट वाली लड़की को यह भी कहते हैं कि ले भई अब यह घर तेरा हो गया। डाक्यूमेंटरी फिल्म में इस अभियान की पूरी यात्रा दिखाई जाएगी कि कैसे एक नेमप्लेट से यह अभियान 16 हजार से ज्यादा नेमप्लेट तक पहुंच गया है। कई राज्य सरकारों ने भी इस अभियान को अपनाया है और बेटियों के नाम नेमप्लेट लगानी अलग-अलग गांवों व शहरों में लगाई है।

Edited By: Anurag Shukla