पानीपत/कुरुक्षेत्र, [पंकज आत्रेय]। शिव के कई मंदिर अपनी वास्तुकला और रहस्‍यों के लिए जाने जाते हैं। इन रहस्‍यों के बारे में आज तक कोई कुछ नहीं समझ पाया है। कोई इसे चमत्‍कार कहता है तो कोई ईश्‍वरीय शक्ति। एक ऐसा ही शिव मंदिर स्‍थापित है कुरुक्षेत्र में। तो आइए जानते हैं इस शिव मंदिर के रहस्‍य को। 

कुरुक्षेत्र के पिहोवा के गांव अरुणाय में स्थित संगमेश्वर महादेव मंदिर भी चमत्कार और लोक कथाओं की वजह से काफी प्रसिद्ध माना जाता है। बताया जाता है कि ऋषि विश्वामित्र के श्रप से मुक्त होने के कारण देवी सरस्वती ने यहीं पर शिव की आराधना की थी, जबकि यहां साल में एक बार नाग और नागिन का जोड़ा देखा जाता है। यह जोड़ा शिवलिंग की परिक्रमा करने के कुछ देर बाद खुद-ब-खुद चला जाता है। आज तक इस जोड़े ने किसी भी श्रद्धालु को नुकसान नहीं पहुंचाया। इनके दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ जाती है। दर्शन करने के बाद ये जोड़ा कहां जाता है किसी को कुछ नहीं पता। ये कहां से आते हैं और कहां चले जाते, इसका पता अब तक कोई नहीं लगा पाया है। 

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अरुणा व सरस्वती का संगम होता है यहां 
पुराने समय से इसे अरुणा और सरस्वती नदी के संगम का स्थल माना जाता है। मंदिर के पास से सरस्वती नदी गुजरती है। पुराणों के अनुसार महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋ षि में एक दूसरे से अधिक तपोबल हासिल करने की होड़ लगी हुई थी। तब विश्वामित्र ने सरस्वती को छल से महर्षि वशिष्ठ को अपने आश्रम तक लाने की बात कही, ताकि वे महर्षि वशिष्ठ को समाप्त कर सकें। श्राप के डर से सरस्वती तेज बहाव के साथ महर्षि वशिष्ठ को विश्वामित्र आश्रम के द्वार तक ले आईं। लेकिन जब विश्वामित्र महर्षि वशिष्ठ की ओर बढ़ने लगे तो सरस्वती महर्षि वशिष्ठ को पूर्व की ओर बहा कर ले गईं। इससे विश्वामित्र क्रोधित हो गए और सरस्वती को खून से भरकर बहने का श्रप दे दिया। खून का बहाव शुरू होने पर सरस्वती के किनारे राक्षसों ने डेरा डाल लिया। महर्षि वशिष्ठ ने सरस्वती को यहां प्रकट हुए शिवलिंग की आराधना करने को कहा। सरस्वती ने इसी तीर्थ पर शिव की आराधना की तो भगवान शिव ने उसे विश्वामित्र के श्रप से मुक्त कर फिर से जलधारा से भर दिया। तभी से यहां भगवान शिव की आराधना शुरू हो गई।

वास्‍तुकला का नायाब नमूना
कुरुक्षेत्र में वास्तुकला का नायाब नमूना देखना हो तो पिहोवा से मात्र छह किलोमीटर दूर अरुणाय गांव स्थित संगमेश्वर महादेव मंदिर का रूख जरूर करें। श्रीपंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा की देखरेख में संग्मेश्वर महोदव मंदिर में व्यवस्था होती है। महाशिवरात्रि के मौके पर वार्षिक मेला आयोजित होता है। 

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ये है मान्‍यता
मान्यता है कि यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक व पूजन करवाने और बेल वृक्ष पर धागा बांधने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बड़े-बड़े राजनेता और व्यापारी मन्नतें मांगने के लिए बेल वृक्ष पर मन्नत का धागा बांधते हैं और जब वह मन्नत पूरी हो जाती तो धागा खोलते हैं। महाशिवरात्रि में भगवान का जलाभिषेक करने के लिए बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मंदिर परिसर में लंबी कतारें लगती हैं। कई बार यह कतारें गेट से बाहर निकलकर सड़क तक पहुंच जाती हैं।

इस तरह पहुंचें
मंदिर अंबाला रोड पर पिहोवा से लगभग छह किमी दूर उत्तर पूर्व में स्थित अरुणाय गांव में है। श्रद्धालु निजी वाहन से यहां पहुंच सकते हैं, जबकि पिहोवा से चलने वाली बसों के माध्यम से भी गांव अरुणाय पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर में एक छोटा सा कुंड भी है, जिसके दर्शनों के लिए बड़ी तादाद में श्रद्धालु हर साल यहां आते हैं। बड़ी तादाद में कावड़िये भगवान संगमेश्वर का गंगा जल से अभिषेक करते हैं और यहां नतमस्तक होने के बाद ही अपने घर की ओर जाते हैं।

हर साल जाने का मिलता है मौका : सुमित गुप्ता
श्रद्धालु सुमित गुप्ता ने कहा कि संगमेश्वर महादेव मंदिर उनके घर से 25 किलोमीटर दूर है। उन्हें वहां पर जाकर शांति मिलती है। इसलिए हर साल वे महाशिवरात्रि पर पूजा करने के लिए जाते हैं। मंदिर परिसर में सकारात्मक प्रभाव मिलता। अब तक के जीवन का शायद ही कोई साल ऐसा रहा हो, जब उन्हें यहां आने का मौका न मिला हो। भगवान के दर्शन मात्र से ही उन्हें असीम सुख की प्राप्ति होती है।

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फल-फूलों से शिवलिंग का श्रृंगार
सावन माह का शुभारंभ होते ही संगमेश्वर महादेव मंदिर की छठा निराली नजर आने लगती है। शिवलिंग को फूलों और फलों से विशेष तौर पर सजाया जाता है। इस तीर्थ के दर्शन करने वालों में दूर-दराज के श्रद्धालु भी शामिल हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल के अलावा बिहार से आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद भी कम नहीं है।

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Posted By: Anurag Shukla