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SYL dispute: हरियाणा-पंजाब में SYL पर गर्माई राजनीति, पढ़ें पूरे विवाद के बारे में

इन दिनों एसवाईएल (SYL) का विवाद लगातार बढ़ रहा है। हरियाणा और पंजाब सरकार के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। दिल्‍ली पंजाब और हरियाणा सरकार भी इस मसले को नहीं सुलझा पा रही। पढ़ें आखिर ऐसा क्‍या है एसवाईएल विवाद में।

By Anurag ShuklaEdited By: Published: Thu, 08 Sep 2022 04:49 PM (IST)Updated: Thu, 08 Sep 2022 04:49 PM (IST)
एसवाईएल नहर को लेकर हरियाणा और पंजाब सरकार में विवाद गहराया।

कैथल, जागरण संवाददाता। हरियाणा और पंजाब राज्‍य के बीच पानी को लेकर राजनीतिक विवाद काफी पुराना है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच चुका है। पंजाब और हरियाणा के बीच में अब तो दिल्‍ली सरकार भी भी आ गई है। एसवाईएल को लेकर अब राजनीति भी गर्माती जा रही है। आइए जानते हैं कि आखिर कितना पुराना है एसवाईएल विवाद और क्‍या है ये।

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खेतीबाड़ी के लिए लाइफलाइन एसवाईएल

हरियाणा की खेतीबाड़ी के लाइफलाइन मानी जाने वाली सतलुज-यमुना लिंक नहर का दशकों से किसानों को इंतजार है। माना जाता है कि समझौते के तहत इसमें अगर पानी आता है तो आधे से ज्यादा प्रदेश की कृषि योग्य भूमि को फायदा होगा। सिर्फ हरियाणा ही नहीं, दिल्ली भी इससे लाभान्वित होगी, क्योंकि यह सीधे यमुना में रावी और ब्यास का पानी लेकर आएगी। यमुना दिल्ली की प्यास बुझाती है।

पंजाब से हरियाणा के अलग होते ही शुरू हुआ विवाद

सतलुज-यमुना लिंक नहर यानि एसवाईएल। इसकी कुल लंबाई 214 किलाेमीटर है। अगर एसवाईएल के विवाद की पृष्ठभूमि पर एक नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि यह हरियाणा के पंजाब से अलग होने के साथ ही शुरू हो गया था। वर्ष 1966 में जब हरियाणा के अलग राज्य बनने के बाद उसके हिस्से का पानी देने की योजना पर काम शुरू हुआ, लेकिन पंजाब को यह मंजूर नहीं था।

बनाई गई थी ये योजना

पंजाब के मंजूर नहीं होने पर सतलुज और ब्यास नदी के जल का हिस्सा हरियाणा को देने के लिए सतलुज-यमुना लिंक नहर बनाने की योजना बनाई गई। पंजाब के तत्कालीन सियासतदानों का तर्क था कि यह रिपेरियन सिद्धांत के खिलाफ है। यानी जिस राज्य में नदी बहती है, उसके पानी पर उसी राज्य का हक होता है।

15 साल बाद बनी थी सहमति

लंबी जद्​दोजहद के बाद वर्ष 1981 में दोनों राज्यों के बीच पानी के नए सिरे से आवंटन की सहमति बनी। इसके चलते 1982 में पंजाब के गांव कपूरी से नहर बनाने का काम शुरु किया गया। वर्ष 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन अकाली दल नेताओं ने पानी के आकलन के लिए एक ट्रिब्यूनल बनाने पर सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वी बालकृष्ण एराडी की अध्यक्षता में इस ट्रिब्यूनल का गठन किया गया। वर्ष 1987 में इस ट्रिब्यूनल ने पंजाब को आवंटित पानी में पांच एमएएफ और हरियाणा को आवंटित पानी में 3.83 एमएएफ तक की बढ़ोतरी करने की सिफारिश की थी, लेकिन पंजाब का रुख शुरू से ही पानी नहीं देने का था।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

इसके चलते वर्ष 1996 में एसवाईएल निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हरियाणा के हक को जायज ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 और 2004 में पंजाब को एसवाईएल को पूरा करने के निर्देश दिए। एसवाईएल निर्माण के बजाय पंजाब ने वर्ष 2004 में विधानसभा में जल समझौता रद करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के अधिनियम की वैधता पर निर्णय लेने के लिए सुनवाई शुरू की और यह माना कि पंजाब नदियों के जल को साझा करने के अपने वादे से पीछे हट गया है। वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एसवाइएल नहर के मुद्दे पर केंद्र को मध्यस्थता के माध्यम से बातचीत करते हुए मामले को निपटाने का निर्देश दिया।


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