अंबाला, जेएनएन। अंबाला छावनी के मिट्ठापुर में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली भूपिंदर कौर का छोटे बेटा नरेंदर सिंह सेना में लेफ्टिनेंट बन गया। नरेंदर के पिता जोगिंदर सिंह ऑटो चलाकर परिवार का गुजारा करते थे। वर्ष 2003 में उनका निधन हो गया था। इसके बाद मिट्ठापुर चौक पर एक कमरे में अपने दोनों बेटों के साथ भूपिंदर ने छोटी सी दुकान खोली। मां का त्याग और बड़े भाई की हाड़तोड़ मेहनत रंग लाई। नरेंदर ने लगातार 12 बार सेना में भर्ती होने के लिए प्रयास किए। अब वह लेफ्टिनेंट के पद पर चयनित हुए हैं। अभावों के बीच पले-बढ़े वाले नरेंदर अब क्षेत्रवासियों के लिए मिसाल बन गए हैं।

पिता की मौत के समय 14 साल का था नरेंदर

वर्ष 2003 में जोगिंदर सिंह की मौत के समय बड़ा बेटा ओंकार सिंह 16 साल और छोटा बेटा नरेंदर मात्र 14 साल का था। गरीबी के बीच 5वीं से 8वीं तक सरकारी स्कूल में शिक्षा ग्रहण किया। पढ़ाई में शुरू से ही नरेंदर की गिनती होनहार छात्र में होती थी। 9वीं से 12वीं तक समसेहड़ी में शिक्षा ग्रहण के दौरान प्रिंसिपल रेनू गुप्ता के प्रोत्साहन को आज भी नरेंदर याद करते हुए इस उपलब्धि का श्रेय देते हैं।

हाई स्कूल में 97 फीसद मिले थे अंक

नरेंदर ने वर्ष 2012 में दसवीं में 97 फीसद अंक हासिल करके स्कूल का नाम रोशन किया। वर्ष 2014 में 12वीं में 84 प्रतिशत मिले। बीटेक करने के लिए जालंधर के पंजाब टेक्निकल विश्वविद्यालय पहुंचा और 2018 में पास आउट हुआ। बीटेक करने के बाद सेना में भर्ती होने से पहले अंग्रेजी का कोर्स करने के लिए छावनी के अमेरिकन कोचिंग में दाखिला लिया। यहां नरेंदर को किसी ने महेशनगर में रहने वाले पूर्व कर्नल राम किशन गुप्ता के बारे में बताया। यहीं से शुरू हुआ इनका सफर।

ट्यूशन पढ़ाकर उठाया तैयारी का खर्च

पूर्व कर्नल राज किशन गुप्ता ने सेना में भर्ती होने की प्रारंभिक से बारीकियों से अवगत कराते हुए तैयारी में मदद की। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद हाई स्कूल की मेरिट के आधार पर अंबाला छावनी के जीपीओ में ग्रामीण डाक सेवक के रूप में नरेंदर का चयन हुआ। अक्टूबर 2019 से सितंबर 2020 तक ग्रामीण डाक सेवक की नौकरी की। इस दौरान खाली समय में उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी तैयारी का खर्च उठाना शुरू कर दिया।

बड़े भाई ने निभाया पिता का फर्ज

नरेंदर बताते हैं कि जिस समय पिता जी का निधन हुआ उस समय बड़े भाई ओंकार सिंह की उम्र 16 साल की थी। घर और पढ़ाइ का खर्च उठाने के लिए उन्होंने अपनी शिक्षा छोड़कर आटो चलाना शुरू कर दिया। दिन रात आटो चलाकर होने वाली कमाई से खर्च उठाते थे। इसके बाद खुद को पढ़ाई न करके भाई के सपने को साकार करने में जुट गए।

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Edited By: Umesh Kdhyani