पानीपत/करनाल, [पवन शर्मा]।  बेटा, मेरी इन बूढ़ी आंखों ने एक नहीं, तीन-तीन त्रासदी देखी हैं। जब पैदा हुई तो पूरा देश प्लेग की चपेट में था। हर तरफ लोगों को मरता देख दिल सिहर उठता था। फिर 1947 में आजादी के बाद पाकिस्तान से भारत आए तो चारों तरफ भड़के दंगों के बीच लाशों के ढेर देखे। अब कोरोना कहर बरपा रहा तो मन करता है कि राष्ट्र को बचाने में हर सांस समर्पित कर दूं। 72 साल पहले सोना बेचकर सिलाई मशीन खरीदी थी। आज संतोष होता है कि आज इसी मशीन से जरूरतमंदों के लिए मास्क बना रही हूं...।

ये शब्द करनाल के सदर बाजार में रहने वालीं विद्यावंती के हैं, जिनका जज्बा यकीनन अनुकरणीय है। 97 वर्ष की जिस उम्र में शरीर साथ नहीं देता, तब वह बुलंद हौसले से जरूरतमंदों के लिए अपनी पुरानी सिलाई मशीन से मास्क बना रही हैं। सेवा भारती के आह्वान पर विद्यावंती और पूरा परिवार दिन-रात इसी सेवा में जुटा है। बेटे गोपाल कृष्ण शर्मा बताते हैं कि मां को सदा काम करते ही देखा। छोटे थे तो मां दूध पिलाते समय भी सिलाई करती रहती थीं।

यह परिवार विभाजन के बाद भारत के जम्मू क्षेत्र में साम्बा सेक्टर स्थित अला गांव आ गया था, जो पाक सीमा से महज चार किमी. दूर है। पिता पंडित द्वारिकादास से विवाह होने पर वह करनाल आ गईं। यहां उन्होंने सिलाई में डिप्लोमा किया और घर में रखी सिलाई मशीन से कपड़े सिलने शुरू किए। यह मशीन उनके बड़ों ने विभाजन से पहले पाकिस्तान में सोना बेचकर खरीदी थी। तब सोने का रेट 90 रुपये तोला के आसपास था। आज ङ्क्षसगर कंपनी की इसी पुरानी मशीन से वह कोरोना संक्रमण रोकने के लिए मास्क बना रही हैं, जो सेवा भारती के जरिए जरूरतमंदों को दिए जाते हैं। 

Panipat LockDown

विद्यावंती ने जागरण को बताया कि पूरा परिवार उनका साथ दे रहा है। बेटे गोपाल, बहू कृतिका व पोते हार्दिक सहित पोती निष्ठा और नुपूर ने काम बांटा हुआ है। हर दिन परिवार 25 से 50 तक मास्क बनाता है। लक्ष्य बस एक है कि ज्यादा से ज्यादा मास्क बनाकर कोरोना से जंग में देश का साथ दिया जाए। वहीं, परिवार से जुड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क प्रमुख कपिल अत्रेजा कहते हैं कि यह उदाहरण सबके लिए अनुकरणीय है। इसी जज्बे के साथ पूरा देश सेवा में जुटे तो कोरोना का सफाया होने में समय नहीं लगेगा।   

जीवट की मिसाल 

विभाजन के समय विद्यावंती गर्भवती थीं और भारत आकर उन्होंने बिटिया को जन्म दिया, जो बाद में गुजर गई। कुछ समय बाद बड़े बेटे सुरेंद्र का जन्म हुआ, जो दस वर्ष की आयु में टीचर के हाथों लगे डंडे की चोट से ब्रेन में रसौली के शिकार हुए और उनकी आंखों की रोशनी चली गई। पति पंडित द्वारिकादास किराने की दुकान पर काम करते थे। ऐसे में जीवट की धनी विद्यावंती ने डिप्लोमा किया और फिर सिलाई करके परिवार चलाने में भरपूर योगदान दिया।

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Posted By: Anurag Shukla

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