कलायत (कैथल), [रणबीर धानियां]। महाराजा पटियाला यादवेंद्र सिंह के राज पंडित कलायत निवासी श्रीनिवास शास्त्री के परिवार को 1947 के भारत-पाक विभाजन महासंग्राम के दंश को झेलना पड़ा था। उस समय कलायत पटियाला रिसायत का संभाग था। इस दौरान पाकिस्तान के बहावलपुर में स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय में श्रीनिवास बतौर प्रिंसिपल नियुक्त थे।

उन्होंने वर्ष 1939 में बनारस से शास्त्री की तालीम हासिल की थी। वर्ष 1941 में बहावलपुर स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय में उन्हें इस पद पर सेवा देने का अवसर मिला था। बहावलपुर में वे अपने 10 वर्ष के पुत्र पद्मनाभ व पत्नी केसर देवी को लेकर आए थे। पिता के बेहद कडक़ स्वभाव के कारण पद्मनाभ ने उनसे पढऩे से इंकार कर दिया। जब बनारस से शिक्षा ग्रहण करके लौटे स्वामी रामशरणदास शास्त्री से पद्मनाभ से मिलना हुआ तो वे उनके शिष्य बन गए और पढऩे को राजी हो गए।

पद्मनाभ बचपन से ही आरएसएस विचारधारा से जुड़े थे। जब उनके पिता पटियाला महाराज के राज पंडित बने तो पुत्र पद्मनाभ अपने पिता व माता के साथ नहीं गए। 15 वर्ष की आयु में पद्मनाभ लाहौर विश्वविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा पास करके शास्त्री बन गए। वर्ष 1947 में देश के विभाजन को लेकर जंग शुरू हो गई। रक्तरंजित तहरीरें हिंदुस्तान व पाकिस्तान में लिखी जाने लगीं। सदियों से एक साथ रहने वाले हिंदू-मुस्लिम एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए और कत्लेआम शुरू हो गया। बहावलपुर व खैरपुर में हिंदुओं के मोहल्ले फूंकने शुरू कर दिए गए।

इन हालातों में घर-कारोबार छोडक़र हर कोई जान बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा था। इस दौरान पद्मनाभ शास्त्री और उनके गुरु स्वामी रामशरण दास स्वयं की जिंदगी की परवाह करने के बजाय त्रासदी में फंसे लोगों को आफत से बाहर निकालने में लग गए। स्वयं संघ की विचारधारा से प्रभावित लोगों के साथ वे इस रेस्क्‍यू कार्य में लग गए। संबंधित इलाके से जो लोग निकल नहीं पाए थे, उन हिंदू परिवारों को रक्षक दल बनाकर एक जगह एकत्रित करने का कार्य शुरू हुआ।

इस दौरान उनके जानी दुश्मन बने लोगों से बचाव के लिए संसाधन जुटाए गए। जब तक आखिरी परिवार को सरकार द्वारा बनाए गए रिफ्यूजी कैंप तक नहीं पहुंचाया तब तक पद्मनाभ अपने गुरु स्वामी रामशरण दास के साथ मोर्चा संभाले रहे। इस कवायद में वे करीब 800 परिवारों को रिफ्यूजी कैंपों के माध्यम से हिंदुस्तान पहुंचाने में सफल रहे। लेकिन पद्मनाभ शास्त्री और उनके गुरु रामशरण दास शास्त्री भारत नहीं पहुंच पाए।

पद्मनाभ को दुनिया में जिंदा पाकर परिवार में नहीं रहा खुशियों का ठिकाना

जब श्रीनिवास शास्त्री के बेटे पद्मनाभ शास्त्री घर नहीं लौटे तो इस स्थिति के लिए पिता पुत्र वियोग में डूब गए। क्योंकि वे यह मान बैठे थे कि पुत्र अब दुनिया में नहीं है। इसलिए हरिद्वार जाकर पुत्र के सारे कर्म करवा दिए। बाकी बचा परिवार अगस्त मास 1947 में ही पटियाला छोड़ कर कुछ समय के लिए कलायत में वापिस आ गया। इस घटना को लेकर परिवार सदमे में था। हालात ऐसे पैदा हुए कि परिवार के पास खाने के लिए अनाज भी नहीं बचा था। 29 दिसंबर 1947 की सांय शास्त्री परिवार के लिए उस समय कुदरत का बड़ा करिश्मा बनकर आई जब बेटे पद्मनाभ और उनके गुरु रामशरण दास शास्त्री विभाजन के पांच महीने के बाद बहावल पुर स्टेट के खैरपुर से पैदल ही जंगलों व बीहड़ों में से होते हुए अपने घर कलायत पहुंच गए। उन्हें दुनिया में पाकर परिवार की खुशियों का कोई ठिकाना ही नहीं रहा।

जब शास्त्री की तालिम हासिल पद्मनाभ को करनी पड़ी फैक्ट्री में मजदूर की नौकरी

श्रीनिवास शास्त्री के पौत्र निशीकांत शर्मा बताते हैं कि रक्त से लिखी विभाजन की तस्वीर लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी थी। रोजगार नहीं थे और खाने के लाले पड़ गए थे। ऐसे में हिम्मत न हारते हुए शास्त्री किए हुए पद्मनाभ ने एक साबुन बनाने की फैक्ट्री में मजदूर के रूप में अपना जीवन शुरू किया। एक साल तक मजदूरी करके परिवार का पालन किया। साथ ही लाहौर से बदल कर सोलन में आए पंजाब विश्वविद्यालय से अपनी शास्त्री की डिग्री हासिल करने के प्रयास शुरू कर दिए। दो साल के प्रयास के बाद उन्हें डिग्री मिली और पैप्सू में शास्त्री की नौकरी मिली फरीदकोट जिला के खारा गांव में। पंजाब हरियाणा के विभाजन के बाद उनकी नौकरी हरियाणा के दादरी के पास मिश्री में मिली। उसके बाद वे स्वयं और पढ़े व साहित्य में आचार्य किया।

पत्नी को पांव पर खड़ा किया

पद्मनाभ शास्त्री ने अपनी पत्नी और अपने भाई बहनों को पढ़ाया। उनके पांचों बच्चे उच्च शिक्षित बनें। जब तक स्कूल में उन्होंने व उनकी पत्नी सुदर्शन शर्मा ने पढ़ाया। विद्या ददाति विनयम को आत्मसात करते हुए हर साल दोनों ने पांच पांच गरीब बच्चों की शिक्षा का बीड़ा उठा कर रखा।

Edited By: Anurag Shukla