विजय गाहल्याण, पानीपत

शहर में लोगों को कैंपर का अशुद्ध व बैक्टिरिया इन्फैक्शन युक्त पानी पिलाया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा लिए गए पानी के सैंपल की जांच रिपोर्ट से यह साफ हो गया है। पानी के कैंपर की सप्लाई करने वाले दो प्लांट के सैंपल फेल पाए गए हैं। अब स्वास्थ्य विभाग प्लांट के मालिकों को नोटिस भेजकर दो सप्ताह के भीतर पानी की क्वालिटी सुधार को कहेगा। अगर तय सीमा के बाद पानी शुद्ध नहीं मिलेगा तो प्लांट सील होंगे।

पानी माफिया नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यप्रणाली का फायदा उठाकर शहरवासियों को कैंपर का अशुद्ध पानी पिला रहा है। इस पानी के पीने से जहां लोग पीलिया व डायरिया की चपेट में हैं, वहीं गंदे पानी की सप्लाई से हर महीने माफिया की जेब में तीन लाख रुपये जाते हैं। इस गोरखधंधे की दैनिक जागरण ने परतें खोली और 14 जुलाई के अंक में पानी माफिया शहर पर काबिज खबर प्रकाशित की तो स्वास्थ्य विभाग को अपना फर्ज याद आया। इसी दिन विभाग की टीम ने तहसील कैंप में गंगा, इंदिरा विहार कालोनी के हंक और अशोक नगर के गंगा प्योर वाटर प्लांट पर छापा मारकर पानी के सैंपल भरे। विभाग की रिपोर्ट अनुसार हंक और गंगा प्योर प्लांट के सैंपल फेल पाए गए हैं।

बिना लाइसेंस के चल रहे हैं पानी के प्लांट

नगर निगम 2010 में बना था। नियम के मुताबिक पानी का प्लांट लगाने से पहले मालिक को निगम से लाइसेंस लेना होता है। प्लांट मालिकों ने लाइसेंस नहीं लिया है। प्लांट बिना लाइसेंस के अवैध रूप से चल रहे हैं। उनकी निगरानी करने वाला कोई नहीं है। न ही पानी के कैंपर के रेट तय किए गए हैं। माफिया ने अपने ही रेट तय कर रखे हैं। एक कैंपर के उपभोक्ता से 20 से 30 रुपये वसूले जाते हैं।

शहर में पानी की लूट के ये हैं जिम्मेदार

-नगर निगम को पानी के प्लांट का लाइसेंस देना होता है। इसके एवज में निगम को राशि मिलती। किसी ने लाइसेंस की जरूरत नहीं समझी। निगम ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। इससे निगम के खजाने पर तो असर पड़ा ही साथ में अशुद्ध पानी की सप्लाई होने से शहरवासी भी बीमारी की गिरफ्त में हैं।

-स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी पानी के प्लांट के सैंपल भरने की होती है। पिछले छह महीने से पानी के सैंपल नहीं भरे गए। इसी वजह से कई प्लांट में आरओ नहीं लगे हैं। जहां लगे हैं वे काम नहीं कर रहे हैं। कैंपर में ट्यूबवेल का गंदा पानी भरकर सप्लाई कर दिया जाता है। इस पर कोई लगाम नहीं है। पहले भी कितने पानी की प्लांट के सैंपल भरे गए इसका भी स्वास्थ्य विभाग के पास पुख्ता रिकार्ड नहीं है।

मामले को लोक अदालत में लेकर जाऊंगा

समाजसेवी नेमचंद जैन ने कहा कि डाई हाउस का केमिकल का पानी जमीनी पानी में मिल चुका है। यह पीने लायक नहीं है। लोग कैंपर का पानी शुद्ध होने की उम्मीद से पीते हैं लेकिन यह भी अब स्वच्छ नहीं है। यह लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। अगर नगर निगम व स्वास्थ्य विभाग ने सैंपल फेल होने वाले पानी की प्लांट के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो वह मामले को लोक अदालत में लेकर जाएगा।

पानी के नाम पर लूट रोकी जाए

आरटीआइ एक्टिविस्ट पीपी कूपर का कहना है कि गंगा का जल डाक द्वारा मंगवा सकते हैं लेकिन शहर में पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिल रहा है। कैंपर के पानी की सप्लाई में लूट मची हुई है। लोगों से मनचाहे दाम वसूले जा रहे हैं। इसके बावजूद भी लोगों को साफ नहीं पीने को नहीं दिया जा रहा है। प्रशासन ने कैंपर के पानी की शुद्धता की समय-समय पर जांच करानी चाहिए। पानी के रेट भी प्रशासन तय करे।

बिना लाइसेंस के प्लांट को देंगे नोटिस

पानी के प्लांट चलाने वालों ने नगर निगम के गठन के बाद लाइसेंस नहीं ले रखा है। अवैध रूप से प्लांट नहीं चलने दिए जाएंगे। इन प्लांट मालिकों को नोटिस भेजा जाएगा।

वीना हुड्डा,आयुक्त, नगर निमग

लघु सचिवालय का पानी भी पीने लायक नहीं

स्वास्थ्य विभाग की टीम ने 12 जुलाई को लघु सचिवालय से पानी के सैंपल भरे थे। इनकी रिपोर्ट आ चुकी है। इसमें यहां का पानी पीने लायक नहीं है। सचिवालय के भूतल, प्रथम तल, और पांचवें तल के आरओ के पानी के सैंपल फेल मिले हैं। यहां पर एसडीएम व डीसी कार्यालय हैं। इसी तरह से बापौली के राजकीय कालेज के आरओ के पानी का भी सैंपल फेल मिला है। यानि यहां के विद्यार्थी अशुद्ध पानी पीने को मजबूर हैं।

वर्जन

गंदे पानी के पीने से लोग पीलिया, हैजा और डायरिया का शिकार हो सकते हैं। पानी को उबाल कर ठंडा करके पीये।

डॉ. अमित कुमार, सामान्य अस्पताल

वर्जन

पानी के प्लांट हंक और गंगा प्योर के सैंपल फेल पाए गए हैं। इनको नोटिस देकर दो सप्ताह में पानी को स्वच्छ करने को कहा जाएगा। अगर फिर भी पानी स्वच्छ नहीं मिला तो प्लांट को सील किया जाएगा।

डॉ. इंद्रजीत धनखड़, सिविल सर्जन

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