पानीपत, जेएनएन। कांग्रेस नेताओं में बिखराव निगम चुनाव में हार का कारण बना। पार्टी को इसका जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा। सिंबल के बिना पार्टी वर्कर एकजुट होकर चुनाव प्रचार नहीं कर सके। दो भाइयों के बीच में हुए बंटवारे में इनेलो फंस गई। 2019 में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा।

निगम के चुनावी बिसात में कांग्रेस की अंतर्कलह दूर नहीं हुई। पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं ने कलह को दबाए रखने के लिए बिना सिंबल के चुनाव लडऩे का निर्णय लिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बुल्लेशाह ने चुनाव से पहले कई दौर की बैठकें की। 

तंवर गुट ने बनाई दूरी
बैठक में तंवर गुट के कार्यकर्ताओं ने दूरी बनाए रखी। अकेले अपने दम पर 26 वार्डों में जिन प्रत्याशियों को समर्थन दिया। उससे पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए के खास रणनीति नहीं बनाई। 

पंजाबी वोट ही नहीं हासिल कर सकीं कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी
कांग्रेस से अंशु कौर पाहवा को मेयर का उम्मीदवार बना कर पंजाबी बिरादरी का शत प्रतिशत वोट भी हासिल नहीं कर सके। चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं में तालमेल की कमी दिखी। भाजपा की मेयर प्रत्येक वार्ड में पार्षद पद के प्रत्याशियों की सभा में पहुंच कर मतदाताओं के सामने अपने विजन रखे। कांग्रेस को इस कमी का नुकसान उठाना पड़ा। 

अब पैठ भेदना आसान नहीं 
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के अहंकार की हार हुई है। भजापा मतदाताओं में पैठ बना चुकी है। खासकर विधानसभा चुनाव के लिए एक वर्ष का समय रह गया है। आगामी चुनाव को देखते हुए कमल को टक्कर देने के लिए पार्टी को चिंतन करना होगा।बूथ लेवल तक अलग से रणनीति भी बनानी होगी।

वर्कर हट गए पीछे 
हाथ का सिंबल न होने से पार्टी के वर्कर पीछे हट गए। चुनाव प्रचार में प्रत्याशियों को मन से सहायता नहीं कर सके। निगम चुनाव के ऐन मौके पर प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर का मीडिया में आया वो बयान भी पार्टी को नुकसान पहुंचा गया। जिसमें उन्होंने कहा था कि पार्टी इस चुनाव को सपोर्ट नहीं कर रही है।  

होमवर्क की कमी 
वार्डबंदी में हजारों वोट इस वार्ड से उस वार्ड में कर दिए गए। कांग्रेस नेताओं ने इस पर कोई होमवर्क नहीं किया। वार्डों में वोटर वोट नहीं डाल सके। इसका भी नुकसान हुआ। 

Posted By: Ravi Dhawan

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