चंडीगढ़ [दयानंद शर्मा]। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस तर्क को गलत करार दिया है कि कामकाजी महिला अपने बच्चे की समुचित देखभाल नहीं कर सकती। कोर्ट के अनुसार कामकाजी महिला को लापरवाह महिला के रूप में प्रस्तुत करना नकारात्मक सोच है। जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि महिला वकील अपने व्यवसाय में तो सफलता हासिल ही कर रही हैं। वे अच्छी माता के रूप में भी सफल हैं।

यह टिप्पणी पीठ ने चंडीगढ़ जिला अदालत के एक फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए की। पीठ ने चंडीगढ़ की पारिवारिक अदालत को तीन महीने के भीतर इस प्रकरण का निपटारा करने का भी निर्देश दिया है। इसके साथ ही तीन साल के बच्चे के संरक्षण को लेकर दायर की गई दादा दादी की पुनर्विचार यााचिका को खारिज कर दिया।

ये है मामला

याची दादा-दादी ,लक्ष्मी राय व अन्य ने हिंदू संरक्षण अधिनियम, 1956 के तहत बच्चे के संरक्षण स्वयं को दिए जाने की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि बच्चे के माता-पिता दोनों वकील हैं। वकालत शुरू करने के बाद बच्चे की मां ने अपने पति और परिवार वालों से दु‌र्व्यवहार करना शुरू कर दिया। बच्चे की भी परवाह नहीं की। पति-पत्नी के बीच झगड़े हुए।

दो वर्ष पहले बच्चे की मां महिला वकील ने घर छोड़ दिया। दादा-दादी की तरफ से हाई कोर्ट को बताया गया कि प्रतिवादी वकालत करने के कारण बच्चे की यथोचित देखभाल नहीं कर सकती। दादा-दादी का पक्ष सुनने के बाद पीठ ने कहा कि बच्चे के संरक्षण का विवाद माता व पिता के बीच तो हो सकता है, दादा-दादी और मां के बीच का नहीं। पीठ ने कहा कि महिला वकीलों की ब्रांडिंग गैर जिम्मेदार के रूप में नहीं की जानी चाहिए, यह अस्वीकार्य है। 

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