चंडीगढ़ [सुधीर तंवर]। यूं तो हरियाणवी लोग किसी भी गलत चीज से समझौता नहीं करते और बात जब मातृभूमि के हितों से जुड़ी हो तो कतई नहीं। देश को हर दसवां सैनिक देने वाले इस प्रदेश में हर कोई मुश्किल घड़ी में सीना तान कर खड़ा होता रहा है। टिक-टॉक सहित चीन के 59 एप बंद किए जाने पर जहां कुछ कथित उदारवादी लोग नाक-मुंह सिकोड़ रहे, वहीं प्रदेश में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का स्टैंड साफ है।

टिक-टॉक से लाखों रुपये कमाने वाली हर दिल की धड़कन सपना चौधरी हों या सोनाली फौगाट और गजेंद्र फौगाट, हर कोई यही कह रहा कि वतन के लिए ऐसे हजार एप कुर्बान। अगर चीन निर्मित जरूरी से जरूरी वस्तुओं को भी त्यागना पड़ा तो एक मिनट नहीं लगाएंगे। दूसरी तरफ टिक-टॉक पर पाबंदी के बाद युवाओं ने अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए रोपोसो सहित अन्य दूसरे भारतीय एप को पना मंच बना रहे हैं।

खिलाड़ियों से यह कैसा खेल

अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवान गीता-बबीता पर आधारित फिल्म दंगल का सीन आपको याद होगा जिसमें नायक आमिर खान बेटी को अच्छी कोचिंग की आस लिए आर्थिक मदद की खातिर खेल अधिकारी के पास पहुंचता है। खेल बजट का हिसाब देते-देते अधिकारी बताता है कि जनाब जितनी राशि महिला पहलवानी के हिस्से में आती है, उससे ज्यादा के तो आप लड्डू ले आए। कुछ ऐसा ही सूबे के सरकारी स्कूलों में हो रहा है। मौजूदा सत्र में मौलिक शिक्षा विभाग ने खेल उपकरणों की खरीद और मैदान के रखरखाव के लिए पूरे प्रदेश के स्कूलों के लिए दस लाख रुपये जारी किए हैं। यानी कि एक जिले के हिस्से में 45 हजार 455 रुपये आए। प्रत्येक जिले में सैकड़ों स्कूल हैं। उस पर तुर्रा यह कि सामान की कीमत, वजन और गुणवत्ता भी राष्ट्रीय स्तर की होना चाहिए। स्कूल मुखिया सिर खुजला रहे कि इस बजट में कैसे अच्छे खिलाड़ी तैयार करें।

किलोमीटर स्कीम ले पछता रहे ट्रांसपोर्टर

हरियाणा में जब से किलोमीटर स्कीम लांच हुई है, कोई न कोई मुसीबत ट्रांसपोर्टरों के गले पड़ जा रही। विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की खींचतान में मामला हाई कोर्ट में पहुंचने से जहां पहले ट्रांसपोर्टर बसें खरीदने के बावजूद साल भर इन्हेंं चलाने के लिए इंतजार करते रहे, वहीं रही-सही कसर लॉकडाउन ने पूरी कर दी। जुमा-जुमा कुछ रोज यह बसें चलीं थी कि महामारी में फिर खड़ी हो गईं। हालांकि स्टेज कैरिज स्कीम में हर सप्ताह एक चौथाई बसें चलाने की मंजूरी मिल गई है, लेकिन किलोमीटर स्कीम के तहत कांट्रेक्ट में बंधे ट्रांसपोर्टर्स को अभी राहत की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। लगातार बढ़ते घाटे से बसों की किस्त भी नहीं निकल पा रही। वहीं, परिवहन समितियों को भी निजी बसों में केवल 50 फीसद सवारी बैठाने की शर्त रास नहीं आई है। उनका तर्क है कि पंजाब की तरह उन्हेंं भी पूरी सवारी बैठाने की इजाजत मिले।

कौन डकार रहा विज्ञापन का पैसा

हरियाणा पुलिस में बीट बॉक्स, पीसीआर शेल्टर, नाकों पर लगने वाले वाले साइन बोर्ड, नोटिस बोर्ड व बैरीकेड्स पर विज्ञापन के नाम पर खूब खेल हो रहा है। सरकारी संपत्ति पर प्राइवेट बैंकों, शिक्षण संस्थानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और औद्योगिक कंपनियों के विज्ञापन प्रदर्शीत किए जा रहे, जबकि यह गैरकानूनी है। शिवालिक विकास मंच के अध्यक्ष विजय बंसल द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत मांगी गई जानकारी में अलग-अलग जवाब देकर महकमे के अधिकारी खुद फंस गए हैं।

महकमे ने पहले बताया कि यह सामान सरकारी खर्च पर खरीदा जाता है और इस पर निजी विज्ञापन नहीं लगाया जा सकता। मामला फंसा तो पलटी मारते हुए कह दिया कि निजी कंपनियां भी कुछ सामान दान कर रही हैं जिन पर वे अपने ब्रांड का विज्ञापन दे देती हैं। हालांकि रिकॉर्ड के नाम पर ऐसा कोई हिसाब महकमे के पास नहीं है। ऐसे में करोड़ों रुपये के गबन के आसार हैं।

 

Posted By: Kamlesh Bhatt

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस