चंडीगढ़ [अनुराग अग्रवाल]। सोनिया गांधी के दामाद राबर्ड वाड्रा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की घेराबंदी तय थी। सीनियर आइएएस अधिकारी डॉ. अशोक खेमका ने वाड्रा की कंपनी की जिस जमीन की म्यूटेशन रद की थी, उसी को मुद्दा बनाकर भाजपा हरियाणा में सत्ता पर काबिज हुई। हुड्डा और वाड्रा की घेराबंदी के लिए राज्य सरकार ने जस्टिस एसएन ढींगरा के नेतृत्व में आयोग का भी गठन किया। आयोग की रिपोर्ट लीकेज के बाद माना जाने लगा था कि सरकार किसी भी समय हुड्डा और वाड्रा पर शिकंजा कस सकती है।

चार साल से सत्तारूढ़ भाजपा पर राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर इस मुद्दे को लेकर खासा दबाव था। भाजपा के मौजूदा प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने कई बार संकेत दिए कि वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। दरअसल, हुड्डा को फंसाने के लिए भाजपा ने कूटनीतिक दांव खेला है।

हुड्डा के विरुद्ध किसी भी तरह की कार्रवाई में भाजपा जल्दबादी के मूड में नहीं थी। सत्ता आते ही यदि वाड्रा और हुड्ड़ा की घेराबंदी कर दी जाती तो राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस यह कहकर सहानुभूति जुटाने की कोशिश करती कि बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है। अब हरियाणा में चुनाव के लिए एक साल ही बचा है और हुड्डा इस समय काफी सक्रिय हैं। वह जनक्रांति रथयात्राओं के जरिये पूरा प्रदेश नापने की तैयारी में हैं। लिहाजा इससे पहले कि हुड्डा तेज चलें, उनकी घेराबंदी कर भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया है।

भाजपा ने जहां हुड्डा व वाड्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का वादा पूरा किया, वहीं प्रदेश की जनता को भी यह संदेश दे दिया कि उसने जो कहा वह करके दिखाया है। हालांकि इस कार्रवाई के बाद अब हुड्डा समर्थक विधायक एकजुट होंगे, लेकिन उनकी कांग्रेस हाईकमान में दबाव की राजनीति कितनी काम आएगी यह देखने वाली बात होगी।

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Posted By: Kamlesh Bhatt