ट्रेन से गिरकर यात्री की मौत, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रेलवे को दिया आठ लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रेन से गिरकर हुई मौत के मामले में रेलवे दावा अधिकरण का फैसला रद कर दिया है।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
HighLights
हाईकोर्ट ने दावा अधिकरण का फैसला रद्द किया।
मृतक के परिवार को आठ लाख रुपये मुआवजा मिलेगा।
रेलवे को चार सप्ताह में भुगतान करने का आदेश।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। रेलवे ट्रैक के पास मिला शव, मृतक की जेब से बरामद असली रेल टिकट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को नजरअंदाज करना रेलवे दावा अधिकरण को भारी पड़ा।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रेन से गिरकर हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में मुआवजे का दावा खारिज करने का फैसला रद कर दिया है। अदालत ने मृतक की पत्नी, दो बेटियों और मां को आठ लाख रुपये देने का आदेश दिया। रेलवे को चार सप्ताह में भुगतान करना होगा। देरी होने पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
जस्टिस हरकेश मनुजा की पीठ ने ज्योति चावला व अन्य की अपील पर यह फैसला सुनाया। मामला सात अगस्त 2012 का है। मृतक तहल चंद के स्वजन के अनुसार, वह अंबाला छावनी जाने के लिए ट्रेन में सफर कर रहे थे।
भारी भीड़ और अचानक झटका लगने से वह हरसाना कलां और राठधना रेलवे स्टेशनों के बीच ट्रेन से गिर गए और उनकी मौत हो गई।
परिवार ने दायर की याचिका
परिवार ने रेलवे दावा अधिकरण, चंडीगढ़ में मुआवजे की याचिका दायर की थी। अधिकरण ने नौ फरवरी 2016 को यात्रा और दुर्घटना से जुड़े साक्ष्य पर्याप्त न मानते हुए दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद स्वजन ने हाईकोर्ट में अपील की।
सुनवाई में हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक के सामान में गुरुग्राम से अंबाला छावनी तक का रेल टिकट, पर्स और 1,995 रुपये नकद मिले थे। रेलवे अधिकारियों ने टिकट का सत्यापन कर उसे असली पाया था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, शव हरसाना कलां और राठधना के बीच रेलवे किलोमीटर संख्या 37/3-5 के पास मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों के कारण सदमे और अत्यधिक रक्तस्राव से मौत की बात कही गई। पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में भी प्रारंभिक तौर पर तेज गति से चलती ट्रेन से गिरने को मौत का कारण माना गया था।
14 साल पुराना है मामला
अधिकरण ने कटिहार एक्सप्रेस के गार्ड की गवाही पर भरोसा किया था। गार्ड ने कहा था कि सात अगस्त 2012 को ट्रेन दिल्ली से सुबह लगभग 10:45 बजे रवाना हुई और यात्रा के दौरान किसी दुर्घटना की सूचना नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने कहा कि इससे केवल उस ट्रेन में घटना की सूचना न मिलने की बात सामने आती है, यह साबित नहीं होता कि मृतक ने किसी दूसरी ट्रेन से यात्रा नहीं की। एक ट्रेन के समय से जुड़े विरोधाभास के आधार पर टिकट, पुलिस रिकॉर्ड और चिकित्सकीय साक्ष्य खारिज नहीं किए जा सकते।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमे जैसे कठोर प्रमाण जरूरी नहीं होते, उपलब्ध साक्ष्यों से संभावनाओं की प्रबलता देखी जाती है।
रेलवे को चार लाख रुपये पर याचिका दाखिल करने की तारीख से भुगतान तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित राशि या आठ लाख रुपये मुआवजा देना होगा जो अधिक हो। चार सप्ताह के बाद भुगतान में देरी होने पर वास्तविक भुगतान तक 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा। राशि आश्रितों को उनके अधिकार के अनुसार बैंक खातों के माध्यम से दी जाएगी।
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