जेएनएन, चंडीगढ़। विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत भूमि को डि-नोटिफाई करने में अब कोई फर्जीवाड़ा नहीं चलेगा। पूर्व सरकारों में भूमि घोटालों से सबक लेते हुए सरकार ने जमीन को डि-नोटिफाई करने की शर्तें कड़ी कर दी हैं। पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्थिरता बनाए रखने के लिए अधिग्रहीत भूमि लौटाने के लिए एक नीति तैयार की जाएगी। बुधवार को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में नई नीति को मंजूरी दी गई।

इस नीति का उद्देश्य प्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित नियमों पर अव्यावहारिक या गैर-जरूरी होने पर अधिग्रहीत भूमि को डि-नोटिफाई करने के लिए प्रक्रिया निर्धारित करना है। अधिग्रहण करने वाला विभाग अगर मानता है कि परियोजना के लिए जमीन अव्यावहारिक या गैर-जरूरी है तो उस जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करने के लिए सरकार से मंजूरी लेनी होगी। जिला स्तरीय उप समिति विचार करेगी कि क्या वास्तव में अधिग्रहीत भूमि अव्यावहारिक या गैर जरूरी भूमि है। इसके अलावा अन्य तमाम पहलुओं पर विचार किया जाएगा।

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इसके साथ ही बैठक में कैबिनेट ने करनाल के तरावड़ी में राजकीय महाविद्यालय के लिए नगरपालिका की 5 कनाल 16 मरला भूमि 85 रुपये प्रति एकड़ के कलैक्टर रेट पर, 85 कनाल 10 मरला भूमि 30 लाख रुपये प्रति एकड़ के कलेक्टर रेट और 80 रुपये प्रति वर्ग गज के विकास शुल्क पर 33 साल के लिए उच्चतर शिक्षा विभाग को पट्टे पर हस्तांतरित करने के शहरी स्थानीय निकाय विभाग के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी। इसके अलावा झज्जर के गांव झांसवा की एक कनाल तीन मरला शामलात भूमि को मैसर्ज विशाका इंडस्ट्रीज लिमिटेड की एक कनाल 6 मरला भूमि के साथ हस्तांतरित करने पर भी मुहर लगा दी।

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स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए ट्रस्ट

भिवानी के गांव रोहणात में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए रोहणात फ्रीडम ट्रस्ट (आरएफटी) गठित किया जाएगा। ट्रस्ट का कार्यालय उपायुक्त के कार्यालय में होगा। ट्रस्ट का उद्देश्य रोहणात के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को पूरी स्वतंत्रता दिलाना है। इसमें मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि भूख, बीमारी और बेरोजगारी से स्वतंत्रता भी शामिल है।

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Posted By: Sunil Kumar Jha