PhD पूरी करने की मोहलत खत्म होने पर शिक्षक को हटाने का फैसला वैध, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज की अपील
एनआईटी कुरुक्षेत्र के एक शिक्षक को पीएचडी पूरी न करने पर नौकरी से हटा दिया गया, जिसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सही ठहराया है।

HighLights
एनआईटी शिक्षक को पीएचडी न करने पर हटाया गया
हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को उचित ठहराया, अपील खारिज
अनिवार्य योग्यता के बिना पद पर रहने का अधिकार नहीं
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के लिए निर्धारित अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता पूरी करना जरूरी है। नियुक्ति के समय पीएचडी हासिल करने के लिए तीन साल दिए गए थे।
डिग्री पूरी नहीं होने पर संस्थान ने पहले दो साल और फिर सात महीने की अतिरिक्त मोहलत दी। कुल पांच साल सात महीने मिलने के बावजूद पीएचडी पूरी नहीं हुई, इसलिए शिक्षक को नौकरी से हटाने का फैसला सही है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी), कुरुक्षेत्र से जुड़े मामले में शिक्षक सी बी सिंह की अपील खारिज कर दी।
जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस मिंदरजीत यादव की खंडपीठ ने कहा कि जब पद के लिए पीएचडी अनिवार्य योग्यता हो और नियुक्ति इसी शर्त पर हुई हो, तो तय समय में योग्यता हासिल न करने वाले कर्मचारी को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने खारिज की दलील
अपीलकर्ता ने कहा था कि अन्य अभ्यर्थियों को पीएचडी पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया, जबकि उन्हें यह सुविधा नहीं मिली। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर इस दलील को खारिज किया।
नियुक्ति के तीन साल बाद उन्हें दो साल का विस्तार और पीएचडी पूरी न होने पर सात महीने की अतिरिक्त मोहलत दी गई थी। ऐसे में भेदभाव का आरोप तथ्यों के विपरीत है।
खंडपीठ ने कहा कि नियुक्ति पत्र की शर्तें स्वीकार करने के बाद उन्हें लागू किए जाने पर चुनौती नहीं दी जा सकती। किसी शर्त को तभी चुनौती दी जा सकती है, जब वह कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर यानी अवैध हो।
पीएचडी के लिए तीन के बजाय छह साल का मांगा समय
अपीलकर्ता ने नियुक्ति पत्र की शर्त संख्या सात को गलत बताते हुए पीएचडी के लिए तीन के बजाय छह साल का समय मांगा था। अदालत ने कहा कि शर्त को चुनौती लगभग छह साल बाद दी गई, जब वह योग्यता हासिल करने में विफल रहे।
अदालत ने यह भी कहा कि पीएचडी की शर्त हटाने पर अपीलकर्ता नियुक्ति के पहले दिन से ही सहायक प्रोफेसर (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद के लिए अयोग्य होते, क्योंकि इस पद के लिए पीएचडी अनिवार्य थी। पांच साल सात महीने बाद भी डिग्री हासिल नहीं होने पर उन्हें पद पर बनाए रखने का आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने 22 सितंबर 2026 को एकल पीठ द्वारा नौकरी से हटाने के फैसले को बरकरार रखा।