जेएनएन, चंडीगढ। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए याची पर 50 हजार का जुर्माना लगाया है। हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को जुर्माने की राशि रिकवरी करने के आदेश दिए हैं। एमडी और एमएस में सीट आरक्षित करने का मामले में याची ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।

हरियाणा के मेडिकल कॉलेजों में एमडी और एमएस कोर्स में सरकार द्वारा आरक्षण नीति को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जिसके बाद सरकार ने अपने आरक्षण नियम में बदलाव कर दिया था। सरकार के इसी जवाब पर हाई कोर्ट ने 6 मई को इस बाबत याचिका का निपटारा कर दिया था, लेकिन याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर कोर्ट से आग्रह किया कि वो अपने 6 मई के आदेश पर पुनर्विचार करे और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जो सीट आरक्षित की गई है वह रद की जाए।

याची ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आरक्षण देने की अधिसूचना इस साल जनवरी में जारी की, जबकि एमडी और एमएस कोर्स में प्रवेश के लिए नीट की परीक्षा पिछले साल नवंबर मेंं हो चुकी थी। प्रवेश परीक्षा के बाद आरक्षण देने की अधिसूचना जारी कर सीट रिजर्व करना उचित नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने भी ऐसे ही एक मामले में आरक्षण देने को रद कर दिया था, क्योंकि प्रवेश परीक्षा के बाद आरक्षण देने की अधिसूचना जारी हुई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से बताया गया कि नवंबर में केवल नीट परीक्षा आयोजित की गई थी, लेकिन सीट आरक्षण व काउंसिलिंग का निर्णय अप्रैल में लिया गया। ऐसे में सरकार का यह निर्णय उचित है।सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि जब याचिका का निपटारा किया गया उसमें साफ कहा गया था कि हाई कोर्ट अब इस मामले में किसी मुददे पर कोई सुनवाई नहीं करेगा और उनके वकील ने भी उस पर सहमति दे दी थी, लेकिन इसके बाद दोबारा याचिका दायर कर आदेश पर पुनर्विचार का आग्रह किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को पचास हजार रुपये का जुर्माना लगाने का आदेश देते हुए हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को जुर्माने की राशि रिकवरी करने के आदेश दिए हैंं।

कोर्ट के आदेश पर सीट आरक्षण में कर दिया था संशोधन

इस मामले को लेकर डॉ. विक्रम पाल सहित अन्य कई डॉक्टरों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि राज्य के मेडिकल कॉलेजों में सत्र 2020-21 में एमडी और एमएस कोर्स की 156 सीटों पर दाखिले के लिए गत वर्ष नवंबर में प्रक्रिया शुरू की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ने इन दाखिलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को अनदेखा कर नियमों के खिलाफ अधिक सीट आरक्षित कर दी। इंदिरा साहनी के केस में सुप्रीम कोर्ट तय कर चुका है कि किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं होगा, लेकिन सरकार ने इन 156 सीटों में से 87 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी हैं और सिर्फ 31 सीटें सामान्य वर्ग के लिए छोड़ी हैं।

अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग सहित अन्य पिछड़े वर्ग के साथ 25 प्रतिशत सीटें इंस्टिट्यूशनल प्रेफरेंस, 5 प्रतिशत सीट दिव्यांगों और 10 प्रतिशत सीट आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित कर दी है। इस लिहाज से 87 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी गई हैं जोकि सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है। हाई कोर्ट के नोटिस के बाद सरकार ने सीट आरक्षण में संशोधन कर दिया था। सरकार ने 156 में से सामान्य वर्ग के लिए 84 सीट आरक्षित कर दी थी। सभी पक्षों की सहमति के बाद हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया था।

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