चंडीगढ़, [अनुराग अग्रवाल]। हरियाणा में बहुजन समाज पार्टी भले ही कभी बड़े राजनीतिक दल के रूप में सामने नहीं आ सकी, लेकिन सरकारें बनाने और सियासी समीकरण बिगाडऩे में बसपा का अहम योगदान रहा है। बसपा के पास उसका मुट्ठी बंद वोट बैंक माना जाता है और यह मायावती की सबसे बड़ी ताकत रही है। इस वोट बैंक के जरिये ही मायावती कई बार हरियाणा की राजनीति में सूत्रधार की भूमिका में रही है। जननायक जनता पार्टी के साथ मिलकर बसपा ने इस बार भी नया राजनीतिक दांव खेला है। यह  दुष्यंत चौटाला के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले का हिस्सा है।

जेेजेपी-बसपा के गठबंधन से कांग्रेस को अधिक नुकसान, भाजपा को बदलनी होगी रणनीति

हरियाणा में अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव में भाजपा हर राजनीतिक दल के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जिस तरह सभी दस सीटों पर जीत हासिल की और 79 विधानसभा सीटों पर बढ़त बनाई, उसके मद्देनजर राज्य में नए गठबंधन जरूरी मान लिए गए थे।

जेजेपी और बसपा गठबंधन से खत्म हुई महागठबंधन की संभावनाएं, हुड्डा को झटका

शुरू में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की ओर से संकेत मिले कि कांग्रेस और बसपा के साथ महागठबंधन की नींव पड़ सकती है। लेकिन, जिस तरह से जेजेपी संयोजक दुष्यंत चौटाला ने बसपा के हाथी का भरोसा जीतने में सफलता हासिल की, उसे देखकर लग रहा कि अब महागठबंधन सिर्फ कल्पना रहेगा।

राज्य के राजनीतिक समर में बसपा हर बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही है। बसपा के टिकट पर एक सांसद और अब तक पांच विधायक चुनाव जीतकर आ चुके हैं। यह अलग बात है कि बाद में यह जनप्रतिनिधि सत्तारूढ़ दल की गोद में बैठकर राजनीति करते रहे। हरियाणा में जातिवाद की राजनीति किसी से छिपी नहीं है। जेजेपी और बसपा यानी जाट और दलित वोट बैंक मिलकर भाजपा को चुनौती देने की सोच रहा है।

दूसरी ओर, कांग्रेस को इस गठबंधन का काफी नुकसान है। पूर्व मुख्‍यमंत्री भूपेंद्र सिंह हु्ड्डा को जाटों का नेता माना जाता रहा है और कांग्रेस दलित वोट बैंक पर भी बरसों से अपना दावा करती आ रही है। इस चुनाव में जाट वोट बैंक के साथ ही दलित वोट बैंक के भी बंटने के आसार हैं।

हाथी की फिदरत, सवारी करवाकर देता रहा पटखनी

हरियाणा की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक विश्वसनीयता हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है। कुलदीप बिश्नोई के नेतृत्व वाली हजकां से लेकर इनेलो और फिर लोसुपा से गठबंधन कर तोड़ देने की कहानी किसी से छिपी नहीं है। अब जजपा के साथ हुए गठबंधन पर इस उम्मीद से निगाह टिकी है कि दुष्यंत अपनी राजनीतिक ट्रिक से मायावती के हाथी को कितना काबू कर पाते हैं।

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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