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'पति नहीं कर सकता पत्नी और नाबालिग संतान के भरण-पोषण से इनकार...', पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Published: Mon, 30 Mar 2026 03:11 PM (GMT+05:30)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति पत्नी ...और पढ़ें

पत्नी और नाबालिग संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पति किनारा नहीं कर सकता: हाई कोर्ट

पत्नी और नाबालिग संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पति किनारा नहीं कर सकता: हाई कोर्ट

HighLights

  1. पति पत्नी-नाबालिग संतान के भरण-पोषण से नहीं बच सकता

  2. हाई कोर्ट ने 25 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता उचित ठहराया

  3. तलाक लंबित होने तक अंतरिम सहायता आवश्यक है: कोर्ट

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि पत्नी और नाबालिग संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पति किनारा नहीं कर सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट, रेवाड़ी द्वारा तय 25 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम गुजारा भत्ता को उचित ठहराते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

जजस्टिस गुरविंदर सिंह गिल और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि जब तक तलाक याचिका लंबित है, तब तक पत्नी और उसके साथ रह रही नाबालिग बेटी के गुजारा भत्ता के लिए अंतरिम सहायता आवश्यक है।

पति ने फैमिली कोर्ट के 13 जुलाई 2022 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे पत्नी को 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया गया था। पति का तर्क था कि वह हरियाणा के सरकारी कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है और उसकी मासिक आय लगभग 75 हजार रुपये है। उसने यह भी कहा कि वह 28 लाख रुपये के लोन की ईएमआई, बेटे की पढ़ाई, बीमार माता-पिता का खर्च और बेटी के खाते में जमा राशि जैसे कई आर्थिक दायित्व निभा रहा है।

इसके अलावा, पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उच्च शिक्षित (एमएससी, बीएड) है और ट्यूशन पढ़ाकर 40-50 हजार रुपये प्रतिमाह कमा रही है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जाना चाहिए। साथ ही उसने यह भी दलील दी कि पत्नी ने उसके खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराया था, जिसमें वह बरी हो चुका है। वहीं, पत्नी की ओर से दलील दी गई कि वह कहीं नौकरी नहीं करती और अपनी नाबालिग बेटी के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी उसके ऊपर है।

ट्यूशन से आय के दावे को भी नकारते हुए कहा गया कि उसके पास नियमित आय का कोई ठोस स्रोत नहीं है।हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के तहत यह देखा जाता है कि क्या पत्नी के पास खुद और बच्चे के पालन-पोषण के लिए पर्याप्त आय है या नहीं। अदालत ने पाया कि पति पत्नी की आय को लेकर कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बेटी के नाम जमा की जा रही राशि का उपयोग पत्नी नहीं कर सकती और न ही लोन की ईएमआई या माता-पिता की जिम्मेदारी का हवाला देकर पति अपने दायित्व से बच सकता है। अदालत ने कहा कि पत्नी और बेटी के खर्च को देखते हुए 25 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि अधिक नहीं है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पति की अपील खारिज कर दी।