24 साल से 'राजा दशरथ' बनकर दर्शकों को रुला रहे रमेश चंद वशिष्ठ, परदे के पीछे की कहानी आपका दिल जीत लेगी
रमेश चंद वशिष्ठ पिछले 24 वर्षों से हसनपुर की रामलीला में राजा दशरथ का किरदार निभा रहे हैं, जिससे दर्शक भावुक हो उठते हैं।

राजा दशरथ के रूप में रमेश चंद वशिष्ठ। यह तस्वीर एआई से एडिटेड है
HighLights
24 वर्षों से राजा दशरथ का किरदार निभा रहे रमेश चंद।
उनके भावुक अभिनय से दर्शक भी अश्रुपूर्ण हो जाते हैं।
युवाओं को रामलीला का प्रशिक्षण देकर संस्कृति संरक्षण।
वीरेंद्र शर्मा, हसनपुर। रामलीला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आस्था को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी है। रामलीला के मंच पर जब राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र राम के वनवास की खबर सुनकर व्याकुल होते हैं और पुत्र वियोग में विलाप करते हैं, तो दर्शक भी भावुक हो उठते हैं।
राजा दशरथ के इस मार्मिक किरदार को जीवंत करने का काम हसनपुर के निकटवर्ती गांव सहनोली निवासी 60 वर्षीय रमेश चंद वशिष्ठ पिछले करीब 24 वर्षों से रामलीला कर रहे हैं। उनके अभिनय की खासियत है कि वे राजा दशरथ के किरदार में इस कदर डूब जाते हैं कि मंच पर उनका विलाप देखकर दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों की आंखें भी नम हो जाती हैं।
2002 से रामलीला मंच से जुड़े रमेश
रमेश चंद वर्ष 2002 से रामलीला मंचन से जुड़े हुए हैं। बीते करीब ढाई दशक से वे लगातार राजा दशरथ की भूमिका निभाकर दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। उनके लिए रामलीला केवल एक मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है।

राजा दशरथ के रूप में वे पिता के प्रेम, पुत्र वियोग की पीड़ा और परिवार के प्रति भावनात्मक लगाव को अपने अभिनय के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि रामायण का प्रसंग दर्शकों के सामने सजीव हो उठता है।
आजीविका के साथ निभा रहे संस्कृति संरक्षण की जिम्मेदारी
रमेश चंद वशिष्ठ का जीवन साधारण है, लेकिन रामलीला के प्रति उनका समर्पण असाधारण है। आजीविका चलाने के लिए वे ड्राइवरी करने के साथ कृषि कार्यों से भी जुड़े हुए हैं। रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बावजूद रामलीला के लिए समय निकालना उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
वे वर्षों से अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच मंचन की तैयारी करते हैं और राजा दशरथ के किरदार को प्रभावशाली बनाने के लिए संवादों तथा प्रसंगों का अभ्यास करते हैं। रामलीला के मंच पर उनकी प्रस्तुति केवल संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि चेहरे के भाव, आवाज में उतार-चढ़ाव और अभिनय के माध्यम से वे पात्र की भावनाओं को दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
यही वजह है कि राम के वनवास और पुत्र वियोग से जुड़े दृश्यों में उनका अभिनय दर्शकों को भावुक कर देता है। उनके अभिनय से प्रभावित होकर रंगमंच से जुड़े युवा भी उनसे प्रेरणा लेते हैं।
युवाओं को दे रहे रामलीला मंचन का प्रशिक्षण
मेश चंद वशिष्ठ का मानना है कि बदलते समय के साथ युवाओं का रामलीला और भारतीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ाव कम होता जा रहा है। आधुनिक जीवनशैली के बीच नई पीढ़ी का रुझान पारंपरिक सांस्कृतिक गतिविधियों से दूर होता दिखाई दे रहा है।
ऐसे में रामलीला की परंपरा को जीवित रखना और युवाओं को इससे जोड़ना बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से वे रामलीला मंचन के लिए युवाओं को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। रामलीला शुरू होने से करीब एक महीने पहले ही वे नए बच्चों और युवाओं को तालीम देना शुरू कर देते हैं।
उन्हें संवाद बोलने, पात्रों की भाव-भंगिमाएं समझने और रामायण के विभिन्न प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत करने का अभ्यास करवाते हैं। उनका प्रयास रहता है कि युवा केवल अपने संवाद याद न करें, बल्कि जिस पात्र की भूमिका निभा रहे हैं, उसकी भावनाओं और प्रसंग के महत्व को भी समझें।
रजिस्टर में दर्ज है रामलीला की पूरी कथा
रामलीला के प्रति रमेश चंद का लगाव इस बात से भी झलकता है कि उन्होंने मंचन से जुड़े प्रसंगों और संवादों को एक रजिस्टर में संजोकर रखा हुआ है। इसी रजिस्टर की मदद से वे युवाओं को रामलीला की कथा समझाते हैं और अलग-अलग प्रसंगों का अभ्यास करवाते हैं।
उनके लिए यह रजिस्टर केवल संवादों का संग्रह नहीं, बल्कि उस परंपरा को आगे बढ़ाने का साधन है, जिससे वे पिछले 24 वर्षों से जुड़े हुए हैं। रमेश चंद चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी रामायण के आदर्शों, पारिवारिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति को समझे।
उनका मानना है कि रामलीला के माध्यम से बच्चों और युवाओं को मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और रिश्तों के महत्व की सीख दी जा सकती है। इसी सोच के साथ वे स्वयं अभिनय करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को भी मंचन के लिए तैयार कर रहे हैं।
