संवाद सहयोगी, बघौला :

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के पूर्व उपकुलपति प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कहा है कि जीवन में संस्कृत का महत्व बढ़ गया है। संस्कृत ऐसी भाषा है जो केवल व्यक्ति के शरीर के साथ संपर्क नहीं बनाती, बल्कि आत्मा के साथ संपर्क बनाती है। संस्कृत का दर्शन ऐसा है कि जहां आत्मा का स्वरूप बताया गया है। जहां किसी का किसी के साथ भेदभाव नहीं है। सब एक हैं तथा एकाकार हैं। विश्व एक घोसला की भांति है, जहां सभी लोग समान भाव से रह सकते हैं। यही परिकल्पना हमारे ऋषि- मुनियों ने लाखों वर्ष पहले की थी।

प्रो. मिश्र बघौला स्थित हरियाणा संस्कृत विद्यापीठ में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के पद से संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संस्कृत को सही मायनों में जानने वाला व्यक्ति भेदभाव की संकीर्णता से ऊपर उठ जाता है। उसे सभी आत्मरूप में ही दिखाई देते हैं। संस्कृत संस्कृति की संवाहिका है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं कि सभी संस्कृत पढ़ें। जो लोग संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद पढ़ते हैं वे भी एक तरह से संस्कृत में निहित ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज वैश्विक दृष्टि से भी संस्कृत की उपयोगिता बढ़ रही है। नई पीढ़ी को भी इस देव भाषा में रूचि दिखानी चाहिए, क्योंकि भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी संस्कृत काफी महत्व रखती है।

इससे पहले संगोष्ठी का शुभारंभ बसपा विधायक टेकचंद शर्मा ने किया। अध्यक्षता लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के पूर्व उपकुलपति प्रो.श्रीधर वशिष्ठ ने की। संगोष्ठी में हरियाणा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश व राजस्थान के 50 प्रतिभागियों ने अपने शोधपत्रों का वाचन किया। संगोष्ठी तीन सत्रों में आयोजित की गई। इन सत्रों की अध्यक्षता श्रीधर वशिष्ठ, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के भोपाल परिसर के प्राचार्य प्रो. विद्यानंद झा व लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के विभागाध्यक्ष प्रो. जयकांत ¨सह शर्मा ने की। विद्वानों ने साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार विजेता डॉ. राजकुमार मिश्र की पुस्तक डयते कथमाकाशे काव्य का लोकार्पण किया। प्राचार्य डॉ.पशुपतिनाथ मिश्र ने सभी का आभार प्रकट किया। संचालन पंकज व्यास ने किया।