जागरण संवाददाता, नूंह:

क्षेत्र में लगातार बढ़ते दहेज हत्या के मामले आज ¨चता का विषय हैं। नूंह जिले में लगातार दहेज के मामले बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि कुछ लोग दहेज प्रथा पर लगाम लगाने के लिए आगे भी आए, लेकिन उनके प्रयास भी सफल नहीं हो सके। आज सामाजिक बुराईयों को लेकर पंचायतों का दौर जारी है। लेकिन अब तक हुई पंचायतों में किसी ने दहेज के मामले को नहीं उठाया। ऐसा लगता है कि पंचायत प्रतिनिधि दहेज प्रथा जैसी बड़ी बीमारी को सामाजिक बुराईयों में नहीं गिनते। उक्त बातें मेवात विकास मंच के महासचिव आसिफ अली चंदेनी ने कहीं।

उन्होंने कहा कि जिस तरह क्षेत्र में दहेज प्रथा बढ़ती जा रही है अगर समय रहते इसे पाबंदी नहीं लगाई गई तो इसके गंभीर प्रणाम क्षेत्र के लोगों को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि अगर पिछड़ेपन और गरीबी की बात आए तो क्षेत्र का नाम सबकी जुबान पर तपाक से आ जाता है, लेकिन दहेज यहां पर सबसे ज्यादा लिया व दिया जा रहा है। जिसके कारण आए दिन नवविवाहिता दहेज की बली चढ़ रही है। दहेज के कारण पती-पत्नी के रिश्ते टूट रहे है। पिछले चार दशक से भी ज्यादा समय से दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए मेव समाज में महापंचायतों का आयोजन किया जाता रहा, लेकिन सभी पंचायतों के नतीजे शून्य रहे। कभी साइकिल और 400 रुपये से शुरू हुआ दहेज आज महंगी 20 लाख रुपये तक की गाड़यिों से भी ऊपर पहुंच गया है। इसके साथ-साथ नकद राशि 11 व 21 लाख तक पहुंच चुकी है। यहां शादियों में आलीशान टेंट लगाना आम बात हो गई है। सरकारी नौकरियों के अनुसार दहेज तय हो रहा है। जिसमें सबसे ज्यादा बोली एमबीबीएस डॉक्टर की है।

हालांकि जेबीटी, जेई, पुलिस में सिपाही, क्लर्क जैसी नौकरियों में भी दहेज के हाईफाई रेट चल रहे हैं। वहीं सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि जितनी ज्यादा शिक्षित कन्या हो उसके माता-पिता को उतना ही ज्यादा दहेज देना पड़ रहा है। ऐसे में कन्या शिक्षा बेमानी साबित हो रही है। वहीं शिक्षित युवा रोजगार प्राप्त के माता-पिताओं की बांछे खुली हुई है। इस समय क्षेत्र में दहेज प्रथा पूरे चरम सीमा पर है। उन्होंने बुराईयों के खिलाफ हो रही गठित कमेटियों से आह्वान किया है कि वो दहेज प्रथा के खिलाफ एक अभियान चलाए ताकि क्षेत्र की बर्बादी को रोका जा सके।

Posted By: Jagran