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गया जी जाने से पहले क्यों जरूरी है कुरुक्षेत्र के पिहोवा में पिंडदान? जहां पांडवों ने कराया था पितरों का श्राद्ध

Published: Sat, 03 Oct 2026 01:53 PM (IST)

कुरुक्षेत्र के पिहोवा में पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान का विशेष महत्व है, जहां पांडवों ने महाभारत युद्ध के बाद ...और पढ़ें

गयाजी जाने वाले श्रद्धालु पहले रुकते हैं कुरुक्षेत्र के पिहोवा में।

गयाजी जाने वाले श्रद्धालु पहले रुकते हैं कुरुक्षेत्र के पिहोवा में।

HighLights

  1. पांडवों ने महाभारत युद्ध के बाद पिहोवा में श्राद्ध किया

  2. गया जाने से पहले पिहोवा में पिंडदान की विशेष परंपरा

  3. तीर्थ पुरोहितों के पास 200 साल पुरानी वंशावलियां सुरक्षित

डिजिटल डेस्क, कुरुक्षेत्र। इन दिनों पितृ पक्ष यानी श्राद्ध चल रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान हमारे पितृ धरती पर आते हैं और उनकी आत्मा की तृप्ती के लिए परिजन उनका श्राद्ध करते हैं।

लोग घरों में श्राद्ध करते हैं लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो गया में जाकर श्राद्ध करते हैं। ऐसा माना जाता है कि गया में तर्पण करने के बाद पितृ तृप्त हो जाते हैं और प्रसन्न हो अपने लोक को चले जाते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि गया के अलावा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पिहोवा में भी श्राद्ध किया जाता है और इसे बहुत ही पवित्र भूमि माना जाता है। मान्यता के अनुसार, कुरुक्षेत्र की धरती को महाभारत से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसी पवित्र भूमि के आसपास एक ऐसा तीर्थ भी है, जिसका संबंध पितरों की शांति और मोक्ष से जुड़ी मान्यताओं से बताया जाता है।

पांडवों ने यहीं किया था कौरवों औप योद्धाओं का श्राद्ध

मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर और पांडवों ने युद्ध में मारे गए अपने परिजनों और अन्य योद्धाओं के लिए यहीं श्राद्ध और पिंडदान कराया था।

यही वजह है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान के लिए पिहोवा पहुंचते हैं। इस तीर्थ की एक और खास बात यहां के तीर्थ पुरोहितों के पास सुरक्षित करीब 200 साल पुरानी वंशावलियां हैं, जिनमें पीढ़ियों से परिवारों का रिकॉर्ड संभाला जाता रहा है।

महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने क्यों किया था पिंडदान?

धार्मिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध में अपने ही परिवार और संबंधियों की मृत्यु के बाद पांडवों ने उनके निमित्त श्राद्ध और पिंडदान कराया था। पिहोवा को इसी वजह से पितरों की शांति से जुड़े प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है। यहां आज भी श्रद्धालु अपने दिवंगत परिजनों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं।

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पिहोवा के पुरोहितों के पास कैसे पहुंची 200 साल पुरानी वंशावली?

पिहोवा तीर्थ की सबसे दिलचस्प परंपराओं में से एक यहां के तीर्थ पुरोहितों द्वारा वंशावलियों को सुरक्षित रखना है। बताया जाता है कि यहां करीब 250 तीर्थ पुरोहित हैं और उनके पास कई परिवारों की करीब 200 साल पुरानी वंशावलियां उपलब्ध हैं। इन दस्तावेजों में पीढ़ियों से परिवारों से जुड़ी जानकारियां दर्ज होती रही हैं।

बड़े-बड़े राजघरानों से लेकर फिल्मी हस्तियां तक करा चुकी हैं पिंडदान

पिहोवा न सिर्फ आम लोग बल्कि कई प्रतिष्ठित परिवारों और हस्तियों से जुड़े रिकॉर्ड होने की बात कही जाती है। गुरुओं के वंशजों, महाराजा रणजीत सिंह, पटियाला और नूरपुर के राजघरानों के वंशजों से लेकर फिल्म अभिनेता सुनील दत्त तक के यहां आने का उल्लेख मिलता है। इससे पिहोवा की तीर्थ परंपरा और इसकी ऐतिहासिक विरासत की एक अलग तस्वीर सामने आती है।

गया से पहले पिहोवा क्यों आते हैं श्रद्धालु?

पिहोवा के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार कुछ परिवारों में ऐसी परंपरा है कि वे गया जाने से पहले पिहोवा में पिंडदान करवाते हैं। तीर्थ पुरोहित आशीष चक्रपाणी के अनुसार, मान्यता है कि पिहोवा में पिंडदान का विशेष महत्व है और हिमाचल सहित कई क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु पहले यहां श्राद्ध कर्म करते हैं, इसके बाद गया जाते हैं।

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