बाबूराम तुषार, पिपली

एक बेटी ने पिता को मेहनत का ऐसा इनाम दिया है कि आज वह फक्र से अपने पास तीन-तीन बेटियां होने के बारे में बताता है। वे कहता है कि मेहनत करते रहना ही इस सृष्टि का नियम है। 32 साल पहले कलकत्ता की न्यू मार्केट से अपनी सोने की अंगूठी गिरवी रखकर कुरुक्षेत्र आए शेख हाफिज कुरुक्षेत्र आए थे। मेहनत मजदूरी कर शेख हाफिज ने काम करना शुरू किया और इसी बीच उसके यहां तीन बेटियां पैदा हुई। मेहनत मजदूरी करते हुए उसे अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा देने की चिता भी सताती। मगर वह धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हुआ और उसने अपनी बेटियों को सफल बनाने के लिए जी-तौड़ मेहनत की। उसी का परिणाम हुआ कि उसकी बेटी हनूफा खातून ने एमबीबीएस की परीक्षा पास कर ली और काउंसिलिग में नूंह में नंबर पड़ा है।

शेख हाफिज ने अपनी दास्तान बयां करते हुए बताया कि वर्ष 1986 में वह कलकत्ता के हुगली की न्यू मार्केट से कुरुक्षेत्र आया था। उसे इसके लिए अपनी सोने की अंगूठी गिरवी रखनी पड़ी थी। कुरुक्षेत्र में आकर उसने शुरू में मेहनत मजदूरी कर आगे बढ़ने के लिए जी-तौड़ मेहनत की। कुछ वर्ष के बाद उसने मेहनत मजदूरी के बलबूते पर एक छोटी सी ज्वैलरी की दुकान स्थापित कर ली। उसकी तीन बेटियां हुईं। मंझली बेटी हनूफा खातून शुरू से ही पढ़ाई में काफी निपुण है और वह हमेशा ये कहती कि पापा मैं एक दिन जरूर डाक्टर बनूंगी। उसकी बेटी ने सपना पूरा कर दिखाया है। हनूफा खातून एमबीबीएस की परीक्षा में पास हुई है और जल्द ही उसका मेडिकल कालेज में एडमिशन होगा। गीता निकेतन आवासीय विद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उसने एमबीबीएस परीक्षा में प्रवेश के लिए आकाश इंस्टीटयूट से कोचिग ली। हनूफा खातून का कहना है कि उसके मन में शुरू से ही अपने पिता का सपना पूरा करने का जुनून था। अब वह डाक्टर बनकर गरीब व असहाय लोगों की मदद करेगी। उसके इस मुकाम तक पहुंचने में उसके पिता और माता का पूरा सहयोग रहा।

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