- कटआउट से संबंधित खबर....... फोटो : 17 नंबर है। जागरण संवाददाता, करनाल :

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सेक्टर सात स्थित सेवा केंद्र में दशहरा पर्व मनाया गया। इस मौके पर सेवा केंद्र की संचालिका राजयोगिनी प्रेम दीदी ने कहा कि प्रश्न यह उठता है कि क्या हमने अपने अंदर के रावण को मारा व जलाया है। रावण का अर्थ ही है रूलाने वाला। मनुष्य के अंदर जो बुराइयां हैं वही तो रावण है। वास्तव में मनुष्य के अंदर की कमजोरियां उसे रूलाती है अर्थात परेशान करती है। रावण के 10 शीश यानि पांच विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार नर में भी हैं तो दोनों के विकारों का संयुक्त स्वरूप हुआ। 10 सिर वाला रावण का पुतला हर वर्ष जलाते हैं और हर बार पुतला कुछ न कुछ फीट और बढ़ा देते हैं। इसका मतलब रावण मरा नहीं। तभी तो हर वर्ष जलाने के बाद भी अगले वर्ष फिर जलाना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि रावण के साथ कुंभकर्ण व मेघनाद का पुतला भी बनाते हैं। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा और कर्ण का अर्थ होता है कान। तो जैसे घड़े में आवाज करने पर वह उसके अंदर ही गूंजती है बाहर नहीं आती, वैसे ही आजकल लोग कुंभकर्ण के समान बन चुके हैं। उन्हें परमात्मा की आवाज सुनाई नहीं पड़ती। कुंभकर्ण के लिए कहते हैं कि वह छह महीने सोता था, छह महीने खाता था। वर्तमान में इंसान का भी वही हाल है खाना, पीना और सोना। चाहे ज्ञान का पूरा घड़ा उनके कान में डाल दिया जाए वह एक कान से सुन कर दूसरे से बाहर निकाल देता है।

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