जागरण संवाददाता, करनाल: श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर में नववर्ष की शुरूआत पर धर्म सभा का आयोजन किया गया। महासाध्वी प्रमिला महाराज ने अपने संदेश में मानव जीवन को परोपकार की ओर से सार्थक बनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि परहित जिनके मन में रहता है, उनके लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

उपप्रवर्तक पीयूष मुनि महाराज ने कहा कि जो मन को पवित्र बनाता है, वही पुण्य है। मन का शुभ भाव ही पुण्य है। भावों से ही विचार बनते हैं। भावों के आधार पर ही आत्मा कभी मलिन तथा कभी पवित्र हो जाती है। पवित्र भावों से ही पुण्य का उपार्जन होता है। पुण्य ऐसी प्रवृत्ति है जिसकी ओर से दूसरों को सुख पहुंचाया जाता है। दूसरों के लिए अच्छी भावनाएं रखकर, शुभ वचन बोलकर, दूसरों को सुख पहुंचाकर पुण्य का उपार्जन किया जा सकता है। पुण्य से ही सभी सुख प्राप्त होते हैं। गृहस्थ पापों की छाया से दूर रहकर पुण्य कर सकता है। दूसरों को सुख पहुंचाने का भाव ही पुण्य है। पुण्य पाप को छोड़ने के बाद जीवन में आता है। प्रत्येक सदप्रवृत्ति में भाव शुद्ध होने पर पुण्य जरूर होता है। राग, अनुकंपा तथा मन की पवित्रता से ही पुण्य मिलता है। पुण्य कोई भी कर सकता है। पुण्य का द्वार मानव मात्र के लिए खुला हुआ है। यदि व्यक्ति इस जीवन में पुण्य नहीं कमाता तो वह दुनिया से खाली हाथ ही जाता है। पुण्य का फल लोग चाहते हैं, परंतु पुण्य नहीं करते हैं। दूसरों को पुण्य से उपलब्ध ऐश्वर्य-वैभव, सुख-साधनों से लोग ईष्र्या करते हैं परंतु वे पुण्य के स्वरूप को समझ कर पुण्य नहीं करते। व्यक्ति को चाहिए कि यदि वह अपने जीवन में सुख का अभिलाषी है तो पुण्य का उपार्जन करे। पुण्य करने से ही इस जन्म में तथा इस जन्म के पश्चात सुख की प्राप्ति होती है।

Edited By: Jagran