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70 साल की अटूट साधना... चाक पर घूमती गीली मिट्टी और तपती मेहनत, इन्हीं हाथों से सजती है दीपावली की रात

Published: Tue, 03 Nov 2026 03:19 PM (IST)

करनाल के चोरकारसा गांव में सुखदेव सिंह काला का परिवार 70 वर्षों से पुश्तैनी मिट्टी के बर्तन बनाने की कला ...और पढ़ें

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HighLights

  1. सुखदेव काला का परिवार 70 साल से मिट्टी कला सहेज रहा

  2. दीपावली के दीये और पारंपरिक पात्र बनाते हैं ये कारीगर

  3. घटती मांग के बावजूद, नई पीढ़ी भी सीख रही यह कला

जागरण संवाददाता, करनाल। मिट्टी को आकार देकर उसमें जीवन के रंग भरना आसान नहीं। कहीं चाक पर घूमती मिट्टी दीये का रूप लेती है तो कहीं अहोई अष्टमी के पूजन का छोटा मटका बन जाती है।

बदलते दौर में जब बाजार की चमक ने पारंपरिक बर्तनों की जगह घेर ली है, तब भी कुछ हाथ अपनी विरासत की लौ बुझने नहीं दे रहे। असंध क्षेत्र के गांव चोरकारसा में सुखदेव सिंह काला का परिवार इसी परंपरा को पीढ़ियों से सहेज रहा है।

करीब 70 वर्ष पहले झज्जर जिले की बेरी तहसील के गांव दुबलधन से चौकीदार प्रेमचंद का परिवार चोरकारसा आकर बसा था। उनके साथ चली आई मिट्टी के बर्तन बनाने की पुश्तैनी कला आज उनके बेटे सुखदेव काला आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए यह काम महज रोजी-रोटी नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिला ऐसा हुनर है, जिसकी अपनी सांस्कृतिक पहचान है।

त्योहारों का मौसम आते ही परिवार के हाथों की रफ्तार बढ़ जाती है। दीपावली के लिए दीये और अहोई अष्टमी के पूजन के लिए छोटे मटके तैयार किए जाते हैं। करवा चौथ पर मिट्टी के करवों की मांग भी रहती है।

मिट्टी गूंथने से लेकर उसे आकार देने, सुखाने और आग में पकाने तक हर चरण में मेहनत और अनुभव की जरूरत होती है। तैयार दीयों में जब दीपावली की रात बाती जलती है तो मिट्टी का यह श्रम घरों के उजाले का हिस्सा बन जाता है।

सुखदेव काला कहते हैं कि मिट्टी के पात्र हमारी परंपराओं और प्रकृति से जुड़ाव के प्रतीक हैं। लेकिन नई पीढ़ी का रुझान इनसे कम हो रहा है। उनके परिवार की रेखा प्रजापत भी इस कला में हाथ बंटाती हैं। 11 वर्षीय बेटी प्राची और 10 वर्षीय बेटा समर भी पुश्तैनी हुनर सीख रहे हैं।

रेखा बताती हैं कि घड़े, सुराही, मटके और कुल्हड़ों की जगह अब आधुनिक बर्तनों ने ले ली है। मांग घटने से कुम्हार परिवारों की आजीविका प्रभावित हो रही है। ऐसे में मिट्टी के दीये और पारंपरिक बर्तन अपनाना केवल खरीदारी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कला और उससे जुड़े परिवारों को बचाने की पहल भी है।

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