प्रदीप शर्मा, करनाल: महज 11 वर्ष की आयु में स्नेहा एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो चुकी थी, जिसे सुनकर जीवन जीने की कल्पना ही फाख्ता हो जाती है। इसे हिम्मत और हौसला ही कहा जाएगा कि आज महज 11 वर्षीय स्नेहा इसे मात दे चुकी है। भले ही इसके लिए उसे ढाई साल की जिद्दोजहद करनी पड़ी हो। आज मामला पढ़ाई का हो या खेलकूद का, स्नेहा हर कसौटी पर खरी उतर रही है। उसके पिता परविद्र ने बच्ची के इलाज और अपने सब्र के निकले सबसे मुश्किल समय ढाई साल को दैनिक जागरण के साथ कुछ इस तरह बयां किए। यह है जंग जीतने की कहानी

परविद्र बताते हैं कि उनकी बेटी गीता स्कूल निगदू में पढ़ती है। वर्ष 2015 में स्कूल की तरफ से खेलकूद प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए गोहाना गई थी। अचानक पेट में दर्द हुआ। उसे वहां से ले आए। करनाल में जांच कराई तो पता चला कि एपेंडिक्स है। डाक्टर ने ऑपरेशन करने के लिए कहा। हमने करा दिया, लेकिन उसके बाद जुलाई 2015 में लगातार बुखार की शिकायत आने लगी। इसकी जांच नीलोखेड़ी के अस्पताल में कराई तो रिपोर्ट ठीक नहीं मिली। स्थानीय डा. धवन ने स्नेहा को सघन जांच के लिए करनाल भेज दिया। यहां से जो रिपोर्ट आई तो होश उड़ गए। टीएलसी 50 हजार के पार थी, ब्लड कैंसर की शिकायत थी। नहीं की एक पल की भी देरी

20 जुलाई 2015 को जैसे ही स्नेहा को कैंसर की आशंका सामने आई तो पीजीआइ चंडीगढ़ बिना देरी किए स्वजन चले गए। वहां चिकित्सकों ने जांच कराई तो उसकी पुष्टि भी हो गई। परविद्र बताते हैं कि यह पल हमारे लिए बहुत ही निराशाजनक और परेशान करने वाला था। चिकित्सकों ने कहा कि कम से कम छह माह यहीं इलाज के लिए रुकना होगा। परविद्र की ज्वाइंट फैमिली होने के कारण एक सहारा मिला और छह माह इलाज के लिए वहां रुके। बेटी के हौसले ने जगाया विश्वास

बच्ची में इतना हौसला था कि इलाज के दौरान हिम्मत नहीं हारी। मनोबल बहुत ऊंचा रहा। करीब ढाई साल के इलाज में आखिरकर स्नेहा ने जिदगी की जंग जीत ली। परविद्र ने कहा जब भी उस पल को याद करता हूं तो भावुक हो जाता हूं। आज मेरी बेटी पूरी तरह से स्वस्थ है। इसके लिए परिजनों और रिश्तेदारों को जो स्नेह और सहारा मिला, उसी से यह संभव हो पाया। इधर इलाज, उधर पढ़ाई की उत्सुकता

दैनिक जागरण से बातचीत में परविद्र ने बताया कि उनकी बेटी खेलकूद में भी आगे रहती है और पढ़ाई में भी। बीमारी के दौरान भी उसकी जिज्ञासा पढ़ाई के प्रति रहती थी। अब पूरी तरह से स्वस्थ है। तीन माह में एक बार जांच के लिए जाते हैं, लेकिन अब चिकित्सकों ने क्लीन चिट दे दी है कि वह ठीक है। कैंसर के बाद 10वीं कक्षा में करीब 91 फीसद अंक लेकर बेटी ने मान बढ़ाया।

Edited By: Jagran