जागरण संवाददाता, कैथल: फसल अवशेष न जलाने को लेकर किसानों में जागरूकता आ रही है। किसान फसल अवशेष को जलाने की जगह उसको मिट्टी में मिलाने लग गए है। जीरो ड्रिल से अवशेषों के बीच ही बिजाई करना शुरू कर दिया है। इससे जहां गेहूं की बिजाई पर खर्च कम आ रहा है। खेत की मिट्टी में सुधार आया है। किसानों का कहना है कि अवशेषों को जलाने की जगह अब हम उसका प्रबंध कर रहे है ताकि प्रकृति के साथ किसी प्रकार का खिलवाड़ न हो सके।

जैविक खाद अवशेषों से कर सकते हैं तैयार

किसान विरेंद्र यादव ने बताया कि धान के अवशेषों को खेत में मिलाने से गेहूं की फसल पर खर्च कम हो रहा है। जुताई करने की आवश्यकता नहीं है। जीरो ड्रिल मशीन के माध्यम से किसान कंबाइन से काटे के अवशेषों में बिजाई कर सकता है। अवशेषों से जैविक खाद तैयार होता हैं।

अवशेष का करते हैं प्रबंधन

किसान दलबीर सिंह का कहना है कि पिछले पांच सालों से धान के अवशेष नहीं जलाए हैं, बल्कि अवशेषों का प्रबंधन करते हैं। कृषि यंत्रों से अवशेष एकत्रित कर उसे बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उनका कहना है कि धान के अवशेष जलाने से पर्यावरण भी प्रदूषित होता है और भूमि की उर्वरा शक्ति भी घटती है। किसानों को फसल अवशेष नहीं जलाने चाहिए। उसका प्रबंधन करना चाहिए।

यूरिया खाद की खपत होती है कम

किसान जगप्रीत ने बताया कि अवशेष न जलाने वाली जमीन में यूरिया खाद का कम प्रयोग होता है। इससे किसान का खर्च कम रहता है। अवशेष जलाने से मृदा की उर्वरा शक्ति में बढ़ोतरी होती है। पैदावार अच्छी होती है। सभी किसानों को भी चाहिए कि फसल अवशेष का प्रबंधन करें ताकि कम से कम बीमारियां फैले।

अवशेषों से किसान कर सकते हैं मुनाफा

किसान मिश्रा यादव ने बताया कि फसल अवशेष नहीं जलाने से पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता है। बीमारियां कम फैलती है। फसल अवशेषों को जलाने की जगह कृषि मशीनों उसका प्रबंध कर रहे है। पर्यावरण के साथ- साथ अवशेषों से अच्छा मुनाफा किसान कमा सकता है। इससे उसकी फसल की कटाई का खर्च निकल सकता है।

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