पेड़ की टहनी से बसा गांव, मरे हुए बच्चे को दिया जीवनदान...363 साल पुराना है झज्जर के सुहरा गांव का इतिहास
झज्जर का सुहरा गांव, जो 1663 में बसा था, अपनी ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। ...और पढ़ें
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फोटो क्रेडिट: AI जेनरेटेड
HighLights
सुहरा गांव 1663 में बसा, 363 साल पुराना इतिहास
बाबा रामदास की समाधि गांव का प्रमुख आस्था केंद्र
होली पर भव्य मेला, कुश्ती दंगल और भंडारे का आयोजन
जागरण संवाददाता, झज्जर। उपमंडल बादली का गांव सुहरा अपनी ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं के कारण आसपास के क्षेत्र में अलग पहचान रखता है। ग्रामीणों के अनुसार करीब 1663 में बसे इस गांव का इतिहास नवाबी दौर से जुड़ा हुआ है।
पहले इसे देवीपुरा के नाम से जाना जाता था। बाद में बादली के शालू गुलिया के यहां आकर बसने के बाद गांव की पहचान सुहरा के रूप में प्रचलित हुई है । वर्तमान में करीब साढ़े चार हजार की आबादी वाले इस गांव में करीब 2200 से अधिक मतदाता हैं। व्यवस्थित ढंग से बसा सुहरा धार्मिक और सामाजिक समरसता के लिए भी जाना जाता है।
गांव की आस्था का प्रमुख केंद्र संत रामदास का मंदिर और उनकी समाधि है। ग्रामीणों के मुताबिक बाबा रामदास को गांव के आराध्य संत के रूप में पूजा जाता है। गांव के बीच स्थित मंदिर में उनकी स्मृति आज भी जीवंत है। यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होते हैं। वर्तमान में महंत दलबीर दास महाराज मंदिर में सेवा कर रहे हैं।
हरिद्वार से लौटते समय बताई जाती है चमत्कार की कथा
मंदिर मंहत दलबीर दास ने बाबा रामदास से जुड़ी लोकमान्यता बताते हुए कहा कि एक बार बाबा हरिद्वार से गंगा स्नान कर लौट रहे थे। इसी दौरान उन्होंने प्रसिद्ध नगर सेठ केलूराम के घर लोगों को विलाप करते देखा। पूछताछ करने पर पता चला कि सेठ का इकलौता पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया है। बाबा रामदास ने तप और सिद्धि के बल पर कहा कि बालक अभी जीवित है।
इसके बाद बालक के उठ खड़े होने की कथा आज भी क्षेत्र में श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है। बाबा से जुड़े ऐसे प्रसंग सुहरा और आसपास के गांवों की लोक स्मृतियों का हिस्सा बने हुए हैं।
बता दे कि ग्रामीणों की मान्यता है कि बाबा रामदास के गांव में आगमन के बाद से पशुधन और जनधन की किसी बड़ी हानि का सामना नहीं करना पड़ा। इसी विश्वास के कारण दूर-दराज से भी श्रद्धालु मंदिर में पहुंचकर माथा टेकते हैं।
बाबा की निशानी से जुड़ी गांव बसने की मान्यता
ग्रामीण बताते हैं कि बाबा रामदास ने गांव को वर्तमान स्थान पर बसाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लोककथा के अनुसार उन्होंने पूर्व दिशा में स्थित पेड़ की एक टहनी से डंडा तैयार किया और ग्रामीणों को गांव के बीच में उसे गाड़ने के लिए कहा। मान्यता है कि इसके बाद इसी स्थान के आसपास सुहरा की बसावट विकसित हुई।
मैदानी भट्टों से जुड़ा है नवाबी दौर का प्रसंग
ग्रामीणों के अनुसार सेठ केलूराम ने बाबा रामदास के कहने पर गांव की जमीन पर पहली बार मैदानी भट्टे स्थापित करवाई थीं। उस समय इन भट्टियों की प्रसिद्धि दूर तक पहुंची। झज्जर के नवाब को जब यहां तैयार होने वाले मैदे की गुणवत्ता का पता चला तो सैनिक बैलगाड़ियों के साथ ईंटें लेने पहुंचे।
ग्रामीणों की मान्यता है कि बाबा की अनुमति के बिना मैदानी भट्टो की ईंट को ले जाने का प्रयास सफल नहीं हुआ और बैलगाड़ियां वहीं रुक गईं। यह प्रसंग आज भी गांव की पुरानी लोककथाओं में सुनाया जाता है।
होली पर लगता है भव्य मेला, दंगल रहता है आकर्षण
सुहरा में होली के अवसर पर आयोजित होने वाला मेला भी गांव की पुरानी परंपराओं में शामिल है। महंत दलबीर दास महाराज के अनुसार बाबा रामदास के समय से चली आ रही इस परंपरा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ लोग मन्नत मांगते हैं। मेले में कुश्ती दंगल आयोजित होता है, जिसमें पहलवानों को लाखों रुपये तक की पुरस्कार राशि दी जाती है। इसके अलावा विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाता है, जो श्रद्धालुओं के लिए निरंतर चलता रहता है।
ग्रामीण मंहत दलबीर दास महाराज, कप्ताल ,बलराज सिंह, ईश्वर सिंह, जयवीर सिंह, राजपाल सैनी, सेठ हुकुमचंद,योगेश प्रतजापत , सतीश गौतम, विनोद ठेकेदार, संतू ठेकेदार, पंडित ईश्वर सिंह गौतम, मास्टर सुद्रर गुलिया, संरपच अक्षय कुमार सहित अन्य ग्रामीणों के अनुसार सुहरा की पहचान केवल एक गांव के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास, लोकविश्वास और सामाजिक एकजुटता की जीवंत विरासत के रूप में बनी हुई है।
